एक आनंद दायक , सुकुनदायक , संतुष्टि से लबरेज़ हमारे लिए एक खुशनुमा पल | बस एक शब्द ....................उड़ान | अब सबाल ये होगा की बाकई एक शब्द अपने में इतने जादू की पुडिया समेटे हुए रहता है | जहाँ सभी इसके दीवाने होते है , सभी इसके चाहने वाले होते है | बिलकुल किसी आशिक की तरह जिसे अपने माशुका को लम्बे समय के बाद दीदार होने की सम्भावना हो | केवल संभावना, जी हाँ |
क्या यह एक शब्द है या इसके अफसाने भी होते है , वो भी बहुत सारे | इसके भी कई रंग रूप होते है | इसमें भी कुछ गणित , भूगोल , या विज्ञान छुपा हुआ होता है | या इसमें रामायण ,महाभारत छुपा हुआ होता है | जी हाँ ......................... बिलकुल |
आप रामायण के कहानी से तो पूरी तरह वाकिफ है हीं | तो आपको इस तथ्य से भी वाकिफ होना चाहिए की , श्रीराम , विष्णु के अवतार होते हुए भी रावण को पराजित करने हेतु बिभिन्न तरह के पशु -पक्षियों का सहारा लिया | और अपने सेना (टीम या योग्यता ) में बिभिन्न तरह की खाशियतों को लैस करते हैं | तो यूँ हीं नही | उनके सेना में शामिल प्रत्येक पशु-पक्षी किसी न किसी ख़ास योग्यता से भरे पड़े हुए लबा-लब थे | सबसे बढ़ कर उनको साथ चाहिए था , केबल साथ | बुराई को मटिया मेट करने व शांति स्थापित करने को |
और बात शिर्फ़ उनके योग्यता की नही थी टीम में शामिल होने के लिए | दोनों तरफ से एक साझा सहमती हुआ होगा | दोनों तरफ की शर्ते लागु हुई होगी , उसके बाद एक-दुसरे के साथ हुए होंगे | वाबजूद इसके की उन पशु -पक्षियों को उनके रूप (परस्थिति ) में ही मदद मिलना था | एकदम सा खुरापाती तरह के बन्दर |उछल -कूद को जीवन संगिनी की तरह अपने स्वभाव में सँभालने बाले | तोड़-फोड़ में अदम्य विश्वास दिखाने बाले | लड़ाई किनसे लड़ना था | थोडा सव्र रखिये वो भी कम काम के आदमी नही थे न उनके अकर्मण्यता के किस्से कम पड़े थे | भाई एक सिर में तो बहुत सारा खुरापात कबड्डी खेलता रहता है वहाँ तो सिर भी 10 गुणी तो खुरापात भी 10 गुणी होगी |
ऐसे महासय से दो-चार करना था श्री-राम को | अब सोचिये क्या उनके मन में दुबिधा न पनपी होगी अपने साथियों व सामने वाले की खुरापात को लेकर | लेकिन नही न , यहीं पर उनका दुबिधा कम न हुई होगी , रिक्ष , भालू गिद्ध और न जाने क्या-क्या , ये लोग भी नंबर लगाये खड़े थे | तिसपर समुद्र महराज भी रावण का चौकीदार बन खड़े पड़े थे रास्ता रोके |
आप यकीन करो की ऐसे स्थिति में राम , राम हीं बने रहे प्रभु न बने नही तो कांड हीं कुछ और होता | सबको सम्मान देते -लेते , सिन्धु पार करते | रावण का संहार करते वापस सकुशल अयोध्या लौटते कई सारे संदेश देते राम | राम बनने की | कैसे राम बनने की तो मोटा -मोटी समझिये | राजगद्दी सँभालने को आदेशित राम अंतिम क्षण में वनवाश को ऐसे चले जाते है जैसे वो राजा बनने के वजाय वन जाने को ही आतुर बैठे हों |
आप किसी चांदनी रात में , एक सुहावने से मौसम में जिसमे हवाएं मंद गति से अपनी लोडियो की चपेट में सारा वातावरण को लेने को चंचल हो , और आपको भी मदहोश कर रहा हो उसके भीनी -भीनी खुशबू | और आप मदमस्त हो रहे हो मौसम की रहनुमाई में | ऐसे क्षण में कोई उदाश पेड़ , पत्ता विहीन कंकाल रूप में शिर्फ़ टहनियां व शाखाएं | तो पेड़ आपको एक क्षण के लिए उदाश तो जरुर ही करेगा | किंतु उससे पहले वो भी उदाश हुआ होगा अपनी पत्तियों की रुसबाई को लेकर |
किंतु इन्ही क्षणों को जीते एक नई शुरुआत होगी उसके जीवन में वो होगी नन्ही नन्ही पत्तियों की अनगिनत कड़ियों के रूप में | और उसकी ये नई शुरुआत शिर्फ़ उसके लिए न होकर बल्कि हवा , बर्षा ,बादल और सबसे बढकर जीवन के रूप में धरती की अंगड़ाई की होगी | हम -सबकी की होगी |
मिलते हैं अगले रविबार को एक नई उड़ान के साथ | तबतक के लिए स्वस्थ रहिये , खुश रहिये |
Superb
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जवाब देंहटाएंAati sunder
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