सोमवार, 3 जनवरी 2022

सुन्दरम

  

             

ख़्वाब को कभी -कभी पुरे होते हुए जागना | कभी कभी बीच ख़्वाब में नींद से जगना | कभी-कभी एक मीठा सा एहसास करा जाती है, तो कभी -कभी दर्द की एक धुंधली सी रेखा खिंच जाती है,  आपके चेहरे पर | कभी -कभी ख्वाबों में रहने के लिए..... .................सदा के लिए .......................एहसास करा जाती है, ये अतरंगी ख्वाबें |
                      सुन्दरम ,शानू ,नौटंकी नामो से प्रचलित अपने मम्मी -पापा के लिए शायद एक ख़्वाब ही था | जिसकी एहसास आज तक बरक़रार है ,बिलकुल खुश्बू की  तरह |

हवा में खुश्बू की फितरत होती है की जितने वह हमसे दुर होती जाती है , उतनी ही अपना  होने की एहसास कराती रहती है ,
 तो अपने आपको हवा में खो जाने का  दर्द भी देती रहती है |
             
                      खैर बात सुन्दरम की ,एक छोटा सा ,नन्हा सा गोरा -चिट्टा ,घुंघराले बालो वाला लड़का जो अपनी पनीली आँखों से व आँख के ऊपर भौवो से ही शरारत करने के लिए जाना जाता था | जिसकी आँखों में सारे जहाँ की बाल -मन में उठने वाली शैतानियों का रेला आया -जाया करता  था | जो शायद समझ भी चूका था, हाथ -पाँव के बदले आँखों से ही शरारत कर सकता है वह |

जो डाक्टर से लेकर कई अजनबियों के नज़र में लड़की होने का  भ्रम देता रहता , उसको हम अपने जिन्दगी के सपनो में कौन-सा सपना कहें या हकीक़त जो अब ख़्वाब बन चूका है , जिसकी खुश्बू आज भी यादों की वादियों में परवाज़ करती है |
           अंतर्द्वंद में एक माँ , एक पिता | दोनों का ऐसा ख्वाव जो सुनहरी रेत की पृष्ठ-भूमि पर सुनहरे सूर्य-किरण से 
चमकता, आँखों को धोका  देने वाली एक मृग-मरीचका जो आँखों को सुकून तो देती है , मन में अपने को सच्चा होने का भ्रम भी |    
        उस भ्रम की स्थिति में एक अस्पष्ट सा चित्र !
         चित्र से याद आया ......... अगर, उस बच्चे का चित्र केनवास पर उतारी जाय तो , हु-ब-हु उसके माँ से मिलता जुलता तस्वीर उतर जायगी | विडंबना देखिये की हमारे यहाँ एक कहावत प्रचलित है " जिस लड़की का चेहरा -शुरत अपने पिता पर होती है ,वह भाग्यशाली होती है ,उसी तरह जिस लडके का चेहरा -शुरत अपने माँ पर गया हो ,वह भाग्य -शाली होता है |"
                     ये कहावत है  , मुझे तब समझ में आया जब उसे हकीकत समझ या की अपने जिन्दगी का हिस्सा या की एक अधूरी ख़्वाब ? निर्णय लेने में एक बाप का दिल ,एक माँ का दिल असमर्थ सा , बेवस सा था | जैसे रेगिस्तान में छाया ढूंढ़ता हुआ कोई राहगीर मीलों चलकर ,खजूर पेड़ के पास पहुँचने की ख़ुशी मनाये | तब आप उसे क्या कहियेगा ! स्वप्नजीवी या वास्तविकता के बीच फँसा इन्सान |
                जो मर्ज़ी .................................... पुकार लीजियगा |
    


                  किंतु एक हकीक़त ........जब देश के नामी- गिरामी अस्पतालों में से एक राजधानी की  अस्पताल के  डाक्टर द्वारा जब उस नन्हे सी जान को " खाली डब्बा " करार दिया जाय | शांत होती शहर की चकाचौंध में रात की अंतिम मेट्रो पकड़ने भागती चार जोड़े पावों को रोकती , कानों में गूंजती डाक्टर की आवाज़ ........" ये खाली डब्बा है,आप-दोनों दुशरे बच्चे की तयारी करो " |
                    रोते हुए आँखों में भी ख़्वाब दस्तक दे जाती है | अस्पताल से मेट्रो स्टेशन तक हम-चार लोगो (उसके नाना -नानी भी थे ) में कोई बात-चित नही | मानो मध्यम होती शहर की रौशनी , व्यस्त रहने वाली शहर की शांत होती कोलाहल , सभी का साथ मिल रहा हो |
                         उस पल को बोझिल बनाने ,व इस पल में भी, उसके माँ-बाप को फिर से  एक सपना बुनने का |
                    एका-एक उस बोझ बने  पल को भंग करती उसके माँ की आवाज़ जो मुझसे से मुखातिब था " मै इसे ठीक , करके रहूंगी " मेरा रुआंसे व भरे गले से शिर्फ़ ' हूं " का प्रति -उत्तर  |
            इन सारी बातो से  बेपरवाह बच्चा अपने बाप के सिने में सिमटा -लिपटा  कंधे पर झूलता हुआ गहरी नींद में मगन सोया हुआ था | उसे क्या पता था डाक्टर के बातो का अर्थ ,उसे क्या लेना था " खाली -डब्बा " जैसे शब्दों से | अच्छा ही था की वह डाक्टरी भाषा से अनजान था ,नही तो उसके भी आँखों में एक नन्हा सा ख़्वाब तैरता " स्वास्थ्य होने " का ख़्वाब | उसकी वे-जान सी हाथ -पाँव के साथ एक निढाल सा शरीर पर एक हँसता हुआ सा चेहरा , उसकी आँखे ही प्यार , गुस्सा ,हंसी -मजाक की शरारती भाव बयाँ कर सकती थी | उस खाली सा डब्बे का हम -दोनों के जिन्दगी में क्या महत्व था , उसके गये कई -बर्षो बाद भी जवाब नही मिल पाया है  ! 
                   
                                              उसे अपने गोद में लिए एक दिन मै , गाना गा रहा था " तुझे सूरज कहूँ या चंदा .....

दीप कहूँ या तारा ......................" | आज तारों के बीच उसे ढूंढने का झूठा सा कोशिश करता बाप | व अपने कोशिस को छुपाती एक माँ |
                              


   डाक्टर के अनुसार वह सेरेब्रल -पाल्सी से पीड़ित था | जिसका उपाय शिर्फ़ -व शिर्फ़ एक माँ-बाप के लिए दुसरे बच्चे की तैयारी करना है | डाक्टर की सलाह अच्छी हो सकती है | एक माँ-बाप के सपनों से सज़ा पहले बच्चे के बारे में अनगिनत ख्वाबों के बीच फंसे दो आँखों के जोड़े का दर्द या बेवसी का क्या कीजियेगा | जिसे भोर का  ख़्वाब भी नही कह , सकते |                                             एक दिन यूँ ही ठण्ड की अँधेरी रात को चीरते हुए ,सूरज अपने आ धमकने की ज़िद्द पर अड़ा हुआ था ,उसके लाव-लश्कर आकाश में चारो तरफ सूरज के साम्राज्य के विस्तार करने में एक सुहावना सा वाताबरण का निर्माण , व सुवह होने की भरोशा दिला रहे थे ,किंतु कुहांसे के बीच फँसे  दम तोरती उनके  प्रयाश |उन्ही पल में  वह नन्हा सा जान अपने अंदर के दर्द को अपने सूर्ख पड़ चुके व उनींदी सी आँखों के बीच सदा के लिए छुपाने की कोशिस में कामयाब हो चूका था | ठण्ड की ही रात को चीरकर आते हुए भोर में आया था वह |
एक पन्ना पलट चूका था ,एक हिस्सा बीत चूका था | हम-दोनों के ज़िन्दगी का | आज वह होता तो उसकी माँ उसके जन्म -दिन की आंठ्वी वर्ष-गांठ मनाने की तैयारी कर रही होती |   
                                             

             ********                                    

                                                                                                       
                     
                    



  

                                     

      
         






                    

68 टिप्‍पणियां:

  1. कहानी पढ़ कर बहुत भावुक हो गया मनोज जी। भगवान आपके करुणा को अवश्य समझ रहे होंगे। आगे अच्छा होगा आपकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी। मेरी दुआ और शुभकामनाए आपके साथ है।...

    जवाब देंहटाएं
  2. Manoj ji be positive aane wale samay ka intjar and prayash kijiye...dubara aapka sundram Aapke pass aayega... please start your journey ....

    जवाब देंहटाएं
  3. सुंदरम का सुंदर प्रस्तुति । धैर्य रखिये मनोज जी

    निकलेगा फिर से नभ में दिनमणि...

    जवाब देंहटाएं
  4. मैं तो निःशब्द हूँ.....
    एक ऐसी प्रस्तुति जो दिल के उस कोने मे आज भी अपनी जगह और धड़कन संभाल रखी है...कहते है कि दिल की धड़कन 72 होती है,लेकिन इस प्रस्तुति को पढ़ने के बाद् यह 73 हो गई...
    आपके दर्द मे वो प्यार छुपा रखा है,जो शायद दिल और दिमाग को एक कर दिया है....
    मैं इसे सिर्फ अहसास नहीं कहूंगा बल्कि आसमान मे किया गया एक अनोखा चित्रण् कहूँगा जो हम् अपनी आँखों से देख पा रहे है और आपका प्यार महसूस कर रहे है,मानो बस अभी बोल उठेगा कि माँ - पापा मैं तो यही हूँ आपके
    धड़कनो के बीच धक् - धक् करता हुआ....
    🤐

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. जी, धन्यबाद , कीमती समय व शुभेक्षा हेतु |

      हटाएं
  5. आप।की भावना ने दिल को छू लिया सर

    जवाब देंहटाएं
  6. दिल को छू जाने वाली एक सुंदर प्रस्तुति।

    जवाब देंहटाएं
  7. कागज के फूल में आपने एक माता पिता के अरमानों को पल पल टूटकर बिखरते हुए देखने का एक अत्यंत हीं असहनीय एवं पीड़ादायक क्षण का जिस प्रकार उल्लेख किया है, इससे मैं अंतर्मन से से बहुत ही भावुक हो गया हूंँ । मेरे पास कहने को शब्द नहीं हैं । बस ईश्वर से इतनी प्रार्थना है कि फिर से आपके जीवन में ईश्वर खुशियांँ ला दें और उजड़ा हुआ चमन फिर से गुलजार हो जाए।

    जवाब देंहटाएं
  8. আপনার কাগজের ফুলের অনুভূতি হ্নদয় ছুয়ে যায়,

    जवाब देंहटाएं
  9. Her line ko chu jane wali hain .( superb sir).👌👌👌👌👌👌

    जवाब देंहटाएं
  10. Shabd bhutla gya hai wartmaan ke aankho me jhakhen. Sabkuch aspast najar aayega.

    जवाब देंहटाएं
  11. Mai bhagwan se prarthana karungi ki koi mata pita iss dard se na gujre our aapki har khuwahish puri ho

    जवाब देंहटाएं
  12. बहुत बहुत धन्यबाद सर जी

    जवाब देंहटाएं
  13. कागज के फूल दिल को छू गया।

    जवाब देंहटाएं
  14. कागज के फूल का जो दिल से एहसास है वह एक पिता की भावना है जो हमेशा दिल के पास है।

    जवाब देंहटाएं