मंगलवार, 18 जनवरी 2022

कैसा वसंत

 सूरज अब कुछ महीनो के लिए उत्तर के हो जायेंगे  | ठण्ड अब अपनी आँगन को समेटेगी , विदाई बेला जो आ गई है | सूरज के उत्तर में आने का सभी को, खेत - खलिहान , पेड़ -पौधे सभी को तो इंतज़ार रहता है |

                     एक सूरज ना जाने कितनो में आशाओं का संचार करते है | इसी इंतजार के घटते समय में , धरती अपना श्रृंगार करेगी | पेड़ -पौधे भी साथ देंगे | नदी -तालाब भी अपने संगीत से साथ निभाएंगे | खेतो में नए -नए किस्मो के फसले होंगी , व उनके सुगंध किसानो को मद-मस्त करेंगे |

                       फूलो का तो पूछिये मत , उनमे अजीब सी मस्ती छायेगी , उसी मस्ती में सारे जहाँ को अपने जैसे खिल - खिलाएंगे , व अपने सुगंध से सभी को भरमायेंगे | फूलो की इन मस्ती से भँवरे व तितलियाँ भी अपना जीवन -रस पाकर कृतज्ञ होंगी | जानवरों और पक्षियों में एक उद्दंड सा दौड़ प्रतियोगिता होगी | छोटी -छोटी पक्षियों के स्वभाव में शरारती भाव करवटें लेंगी , लेकिन एक निश्चल सा भाव , आनंददायी भाव होगी | उनके चहचाहट व अटखेलियों का तो स्वयं सूरज भी इंतज़ार करते रहते है |

            तो फिर क्या धरती , क्या अम्वर , क्या पेड़ -पौधे ,क्या फसल ,क्या किसान ! इन सभी को क्या शिकायत होगी ? परिंदों  की बेपरवाही का !

         इन्ही शोखियों -मस्तियों के मौसम में एक मैना परिवार अपनी छोटी -छोटी पंखो से अपने छोटी-छोटी आँखों में पलते सपनो को उड़ान देती | अपनी उपस्थिति बनाने को आतुर | क्यों न हो आतुर ,वह भी तो सबमे शामिल है | सबके तरह उसे भी वसंत का इंतजार रहता है | जब सभी वसंत को जी लेना चाहता है !

         तो मैना परिवार क्यों पीछे रहे | न उसने कोई गलती किया है , न उसे कोई सज़ा मिला है , तो उसे रोकेगा कौन ?  इस मौसम को जी लेने से ! और उसके यहाँ तो मेहमान भी आने वाले है , अब उसकी दुनिया कुछ बड़ी होगी | खुशियाँ भी बड़ी होगी | मस्ती -अठखेलिया भी बड़ी होगी | साथ हीं बड़ी होगी उसकी जरूरते |

         अभी से ही मैना परिवार अपने जरुरत के हिसाब से नया दुनियाँ ( घोंसला ) बनाने के उद्दयम में व्यस्त है | तिनका -तिनका इकठ्ठा करना होगा , इस मेहनती कार्य में आनंद भी आ रहा है उसे | मानों अपने नन्हे -नन्हे चोंच से गिरते तिनके का कोई परवाह हीं न हो | परवाह भी क्यों हो , नयी दुनिया तो बना के रहेगी | नन्हे सी चोंच में कई सारे तिनके एक साथ उठाना व उनमे से एक दो का गिर जाना ,उसके उद्दयम को कमज़ोर नही कर पाती है | उलटे उसे और तन्मय कर जाती है | 

               दिन भी बड़े होने लगे है , किंतु सभी अब इतने व्यस्त रहने लगे हैं, सूरज के आने व जाने की पता ही नही चलता , मस्तियाँ ,अटखेलिया व इनके बीच भोजन खोजना साथ -साथ तिनके भी इकठ्ठा करना है | कई सारे काम करने होते है | ऐसे ही दिन बीत रहे थे मैना परिवार का |

                         किंतु उसे  पता ही नही है की ,कब से  उसके दुनिया के निचे हल-चल हो रही है | एक नई तरह की हलचल , मानवों के द्वारा  | जिसे मैना परिवार समझ नही पा रहा है | अब उसके उड़ानों में डर का भाव आने लगा है , अब वह उड़ती है कुछ दुर जाती ,वापस लौट जाती है अपने घोंसले में | मानो वह सबसे सुरक्षित जगह हो उसके लिए  | सभी के लिए तो सुरक्षित जगह उसका घर ही होता है , तो मैना परिवार के लिए क्यों नही | अब उन दोनों में से एक घोंसला में रहता है | दूसरा भोजन की तलाश में बाहर जाती है | परन्तु घर में रहने से मुसीबत कहाँ पीछा छोरती है |

                 पेड़ कट कर गिर चूका है , मैना परिवार की दुनियाँ धुल चाट रही है | एक नई दुनिया बसनी है उस जगह पर, निंब रखी जा रही है | उसके दुनियाँ की निंब उखड चुकी थी | कुछ देर की ची -ची की स्वर , गीत है या गुस्सा किसे समझ आनी थी  | भगवान जी ने अच्छा किया है , यहाँ पर एक जीव की भाषा दुसरे को समझ नही आता है नही तो , मैना परिवार के ची-ची की आवाज़ पर भी उसे सज़ा मिलता | दोनों की लम्बी उड़ान ....................दूर........बहुत दूर उड़ जाने के लिए | वहाँ.....जहाँ वह भी वसंत को जी सके , उन्मुक्त वसंत |


                                                                   *******



 

57 टिप्‍पणियां:

  1. Gajab, kahani me twist hai boss achhe achhe kaviyon ki Watt lag jayegi ye kahani samjhana bachhon ka khel nahin

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  2. बहुत ही सुंदर व्यख्यान।

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  3. बहुत सुंदर कहानी सर 👍👍👍👍

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