मंगलवार, 22 फ़रवरी 2022

मुरझाया गेंदा -2


                               एक दम सा साफ़ आकाश वाली बादल , धुप निकला हुआ नीले आकाश के निचे ,कभी आपस में दौड़ लगाती , कभी-कभी एक दुशरे के संग-संग भागती बादल | बिलकुल बर्फ के सामान धुप्प उजला-उजला  | आपके मन को मोहने के लिए काफी होगा ये दृश्य | और क्यों न मोंहे आपका मन ये अल्हर सी बेपरवाह बादल | जिसकी प्रकृति हीं होती है एक हीं दिशा में बढ़ते जाना , बढ़ते जाना तबतक बढ़ते जाना | जबतक उसकी 
हस्ती न बिखर जाए |  किंतु ये अपना प्रकृति नही बदलेंगे |     
                                                                                                            कार्यालय का चपराशी झंडोत्तोलन कार्यक्रम को सम्पन्न होने की तैयारी को अंतिम रूप देने में कुछ ज्यादा हीं व्यस्त है | व्यस्त क्षणों में भी उसके चेहरे पर आज लालिमा बाली भाव आ-जा रही है | और दिनों की तरह पड़ेशान सा भाव आज गायब है उसके चेहरे से | जिसका कारण आज उसके कंधो पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी दी गयी है बड़े साहब के द्वारा | बड़ी जिम्मेदारी तो चेहरे पर भी दिखनी चाहिए , स्वामी होने का एहसास जगता है |
अंदर कहीं उसके शरीर में और चेहरे पर स्पष्ट झलकनी भी चाहिए | "वह " भी महत्वपूर्ण है कार्यक्रम को सम्पन्न करने हेतु |

प्रभुता वाली भाव | क्यों न हो प्रभुता उसके चेहरे पर , सभी  जिम्मेदारी उसी के कन्धो को मजबूत बना रहे हैं | आज  उसकी योग्यता , उसके रंग-बरण , ओहदा  भी पीछे छुट गया है | 
                                                                                         खैर वह बच्चा , मुरझाया सा गेंदा जैसे चेहरे वाला लड़का "प्रसाद " लेने पंहुचा है | बड़े गौर से बड़े -बड़े लोगो को , साहब बाबुओ को देख रहा है | उसके चेहरे पर लोभ की रेखाएं आ-जा रही है | कार्यक्रम सम्पन्न होने की कामना में अधीर सा | दो-तीन जगह और जाना होगा, तब जाकर पेट भर प्रसाद पा सकता है | बहुत सारे बच्चो के बीच ,उनके भीड़ में भी बिलकुल अलग सा उसके नजर कार्यालय के कई परिक्रमा कर चुकी है |
                                               प्रसाद में क्या मिलेगा ,संतुष्ट होने की इक्षा से वह बच नही पा रहा है | इसी बीच  झंडोत्तोलन प्रारम्भ हो चुकी है | अब जाकर संतुष्टि के भाव उसके चेहरे के रंग को बदलने लगी है | व उसके आवाज में भी साथ दे रही है  " गाने में" | नारा लगाने में अब उसके हाथ भी बाहर निकल चुकी है | जय-घोष उसके चेहरे को आत्मबल देने की कोशिश में कामयाब हो रही है |
                                           किंतु ये क्या जय-घोष के बाद प्रसाद पहले बाबू लोगो में बितरण होने लगी है | दुबारा उसके चेहरे पर अधीरता बिराजमान होने लगी है | इसी अधीरता को चीरते हुए वह बाबू लोगो के लिए लगे कुर्शियों के पास पहुँच जाता है | शायद उसे भी प्लेट वाली प्रसाद मिल जाए |
                                             चपराशी का नजर उस पर पड़ा , प्रभुता वाली चेहरे पर गुस्सा के भाव आ गया " तू यहाँ ? कहाँ ..............हट्ट | बच्चा के चेहरे पर झिझकता हुआ सा मुस्कुराहट , अपनी गलती को सुधरने वाली साबित करता हुआ , बाबुलोगो के कुर्शियों से दूर खड़ा हो गया | किंतु एक हाथ सर के पीछे बालो को नोचते दूसरा हाथ प्रसाद के लिए बढ़ा दिया | चपराशी उसके नन्हे हाथो पर जलेबी का आधा टुकरा रख देता है | चल अब यहाँ से फुट|
बच्चा कुछ दूर हटकर प्रसाद दुसरे हाथ में रखकर बच्चो के भीड़ में पुनः खड़ा हो गया प्रसाद के लिए |
                                            किंतु अपने हाथ पर जलेबी के निशान को छुपा नही पाया | पुनः उसी हाथ से प्रसाद मांगने लगा | बाबू-लोगो को प्रसाद खिलाते -खिलाते चपराशी के चेहरे पर प्रभुता के भाव के साथ स्वामिभक्ति के भाव भी आ गया था | अतः बच्चे के हाथ में लगे जलेबी के निशान उसके स्वामिभक्ति को ललकारने लगा | जो की नागवार था | बेईमानी वह भी पिद्दी से लडके के द्वारा | चपराशी प्रसाद के गमले को टेबल पर रखते हुए हवा में अपना हाथ लहराते हुए बच्चे को थप्पर मारने के अंदाज़ में " चल ............भागग |
                                             बच्चा आव देखा न ताव सीधा अपने नाक के सीध में दौड़ लगा दिया और कुछ दूर जाकर अपना दुसरे हाथ वाली प्रसाद को खाने लगा | अब उसके चेहरे पर संतुष्टि के भाव आने लगे थे |
                                                                                                                                                          
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