छोटे पोखरे में या छोटे से तालाब के शांत पानी में , जब आप एक कंकड़ मारते है ,तो उसके शांत पानी के सतह पर एक हलचल दृश्यमान होगी | कई छोटी से बड़ी होती गोलाकार आकृतियाँ | जिसमे शायद कोई संगीत हो ,एक दुसरे से दूर भागने की होड़ में आकृतियाँ , किंतु अपने नियम से बंधी | एक-एक कर शांत पानी के सतह में मिल जाने को व्याकुल |
आपके शांत हृदय को रोमांच व आनंद से भर देती है | फलतः आप कई सारे कंकड़ दे मारते है |
किंतु आप वही कंकड़ एक बहते नदी या सागर में मारते हैं, तो आप दंग रह जायेंगे | बहते हुए नदी या सागर की बेरुखी को देखकर | केवल एक मध्धम सी ध्वनी " ढब्ब " |
अपने गति-मति , अपने लहरों में मद-मस्त , अपनी हीं लय से बंधा हुआ पानी | जो दूसरों में हलचल पैदा कर दे | चाहे तो बड़ी-बड़ी पहाड़ो को पार कर जाये ,चाहे तो कई टीलो को बहाकर समतल बना दे | किंतु आपके द्वारा फेंके गये कंकड़ का मोल वह नही दे सकता है | सबकुछ को अपने में समेटने को , सबको बहाकर दूर ले जाने को , सबको पानी-पानी करने को आतुर पानी |
ठण्ड के दिनों का शुवह , आलस को छोड़कर अंगड़ाई लेता हुआ शुवह | बाकी दिनों से अलग वाली शुवह | सूरज अपने लाल चद्दर में अभी तक सिमटा हुआ मुश्करा रहा है | अभी-अभी तो वह अँधेरी किला को चीरकर निकला है | थोडा जम्हाई ले ले ,थोडा अंगड़ाई ले ले | किंतु गाँव का आलस पीछे छुट चूका है |
आलस का पीछे छूटना तो लाजिमी है | आज पर्व जो है ........... राष्ट्रीय पर्व | बड़े -बुजुर्गो से बढ़कर छोटे-छोटे बच्चो की टोलियों में ज्यादा हलचल है | क्यों न हो उनमे ज्यादा हलचल | किसी भी त्यौहार का असल में तो बच्चे ही इंतज़ार करते है , इस दिन मटरगस्ती होगी, उछल -कूद होगा ,पुरे दिन इधर-उधर घूमना व अपने दोस्तों के संग ,हर-एक जगह की ,स्कूल ,चौक -चौराहे ,जहाँ भी झंडोत्तोलन होगा , वहाँ पर मिलने बाले प्रसाद , व वहाँ पर होने बाले गीत -संगीत सभी का समीक्षा करेंगे | फिर रोकने -टोकने बाला भी तो कोई नही होता है | भागमभाग तबतक रहेगा जबतक की खुद थक -हारकर घर न लौट जांये |
इन्ही बच्चो की टोलियों से इतर , कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं, जो स्वतंत्र अकेले घूमेंगे ,या टोली के नामपर उनके बहन होगी या अपना ही कोई भाई | इन्हें और बच्चो की टोलियों में शामिल होने में हीच-किचाहट होती है | ये हीचकिचाहट ही इनके अक्खड़ सा बेढंग सा कुछ कुछ बेपरवाह सा व्यबहार में पहचान लेकर देती है |
बिलकुल बादलो सा व्यबहार ,कभी उदास तो कभी उजला-उजला तो कभी घंघोड़ काला सा जो सिर्फ धरती की प्यास बुझाने के काम में भागीदार होती है |
कोई कार्यालय भवन , भक्ति गीत हवा में ऊँचे -ऊँचे तैरकर माहौल को भक्तिमय व रोमांचक बनाने में अपनी भूमिका बखूबी निभा रहे हैं | गीत भी ऐसे जो कुछ -कुछ सभी के साँसों से उतारकर खून को गर्म कर रहे है | व्यस्ततम क्षणों में तैयारी अंतिम पड़ाव को पार करने वाली है | इन्ही माहौल में एक 7-8 साल लड़का , जिसका शरीर गंदे से कपडे से लिपटा हुआ , नंगे पाँव अपने हाथों को कपड़े में छुपा कर अपने-आप में ही सिमटा हुआ कुछ खोजते हुए नज़र से इधर -उधड देखता हुआ , कभी उसके चेहरे पर हंसी आता -जाता तो कभी हैरानी का भाव |" प्रसाद " के लिए पहुँचा है | चेहरा ऐसा , जैसे कोई गेंदा का मुरझाया हुआ फूल | एक कुम्हलाया हुआ सा अपने घर का सूरज .........................समेट कर रखा जाय तो फूल नही तो पत्ती ......................( शेष अगले अंक में जारी )
Nice
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जवाब देंहटाएंNxt kb aayega
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