ऐसा चंचल स्वभाव है , या उसके सोम्यता की प्रभाव , आप स्पष्ट नही हो सकते है | किंतु एक बात जिससे आप सहमत होंगे या नतमस्तक | वो की चाँद शीतलता की पराकाष्ठा पर विराजमान चंचलता के स्वभाव से आँख -मिचौली करती रहने वाली हमे अपने सोम्यता से कृतार्थ करती रहती है |
आप कही से भी उसे निहारो , पेड़ के झुरमुटो से या की खाली मैदान से , आँगन से ,खिड़की से, छत से या की बादलो के चादर में छुपते -निकलते | सब जगह एक सा निर्विकार ,निश्चल ,सौम्य ,चंचल ,आँखों में प्रेम के लाल डोरे की घेराबंदी व शरीर में कहीं अंदर झुर-झुरी पैदा करने वाली | कही कोई भेदभाव नहीं , कहीं कोई शिकायत नहीं | बिलकुल हमारे अंदर के रूह की तरह |
ये सारी बातें हमारे अंदर यूँ हीं नहीं पनपते हैं , हमारे अंदर चाँद के नज़रिए के रूप में | इसके पीछे एक गहरी साजिश कह लो या की दादी -नानी के होने का मतलब | इस मतलब ने बखूबी अपनी जिम्मेदारियों को पूरा किया भी | हमको -आपको चाँद की कहानिया परोशती रही | कभी गहरी नींद के आगोश में भेजने के लिए | कभी अनिच्छा में भी खाना खिलाने के लिए | तो कभी =कभी छुटपन के दिनों में भी परियों को लाकर खड़ा करती रही | तब न मालूम होता था परियों के मतलब न उनके सुन्दरता के नमकीन सा भाव | न उसके प्रेम भरी रौशनी के स्वाद |
लेकिन ये सब होता रहा झिझकती चादर में लिपटे-लिपटे | चोरी-चोरी ,चुपके चुपके और हम चाँद के नशे में कैद बिलकुल अफीम के नशे की तरह |
लेकिन कुछ दिनों बाद वो दिन भी आया जब हम चाँद की तलाश अपने आस-पडोश ,स्कूल कोलेज , हाट -बाज़ार करने लगे | लेकिन क्या है न की कबीर साहब कह गये है " प्रेम न मिले हाट -बाज़ार |" इसलिए चाँद तो मिलता रहा , लेकिन उसके प्रेम की शीतलता ही नदारद रहती | तब जाकर खिंच -धकेलकर ऐसा भी दिन आया जब " जंहा जिस स्थिति में होते " अपने चाँद शीतलता मार्का की तलाश में अपने नजरो को सर्च लाइट बनने को मज़बूर करने लगे | इसके बाबजूद कुछ न मिला तो हम चाँद -तारो को भी अपने कसमो वादों में सुमार कर लिया |
शीतलता को हरने के लिए कसमो के बाराती गाजे-बाजे के साथ उतरने लगे | शीतलता भी सौम्यता की सगी रही होगी | झांसे में आने लगी | इसमें शीतलता , सौम्यता की कोई दोष न रही होगी |
उसके कुछ दिनों बाद चाँद ,चाँद हीं रह गया | गोया कोई शब्द हो और बचपन के भूगोल के किसी किताब में खो गया हो | चुप-चाप से बिना किसी शोरगुल के और वर्ष में एक बार दिखने लगा , छलनी के पार से वो भी सामने वाली को | दृश्य कितना प्रेममय ,अपनी नजाकत -नफासत से ओत-प्रोत | चाँद को देखने से पहले हमे देखा जाने लगा और कृतज्ञता चाँद को मिलता रहा | वो भी एक- चौथाई से भी कम के चाँद को |
किंतु अब वो दिन भी आया जब हमे डर लगने लगा | मन घबराने लगा है , बेचैनी सा भाव पनपने लगा है और पेट के बांये तरफ हूक सा उठने लगा है | अब हम चाँद पर ही डेरा जमाने वाले है | सारी कहानी , सारी तन्मयता और सारी कलाबाजियां चाँद के बिना सुना हो जायेगा | या तब हम नीले धरती को निहारेंगे | उसकी कहानियाँ सुनेंगे या उसके तलाशते रहो की गीत गायेंगे | पता नहीं लेकिन एक दृश्य जरुर होगा |
सुना है की चाँद का कोई चाँद नही होता है ! असल मुद्दा तो यही था , फ़ालतू में इतने सारे शब्दों के पीछे पड़ा , भूमिका बाँधा |
वहाँ कैसे व्रत पूरा होगा ? का सवाल मेरे दिलो-दिमाग में कत्थक कर रहे हैं | पर जवाब एक भी हाज़िर नही |ये दिल का मामला है सो दिल से निकलना पड़ेगा | ऐसा सोचने में समय व्यर्थ किये बिना मेरे दिमाग में एक उपाय आया " इश्क भले धरती पर खड़े रह कर चाँद को निहारता हो " वही इश्क चाँद पर लोट-पोट करेगा तभी पूरा होगा सामने वाली का व्रत और हमको देखने के बाद चाँद को देखने का रस्म |
इसके बाद जी ज्यादा घबराने लगा | उसके बाद मन में विचार आया | चाँद तो धरती से ही अच्छा लगता है | तो हम धरती पर हीं रहें " इश्क चलता रहे , प्यार होता रहे |"
जितनी दूरी धरती से चाँद का है , उतनी हीं दूरी चाँद से धरती का है |दोनों का अपना ही अलग , मतलब है | दोनों एक दुशरे के लिए हीं बने हैं | इसका मतलब धरती , धरती ही रहे ,चाँद को अपने में न समाये | बरना हमारे शरीर का एक अंग जीवन के महत्वपूर्ण कार्य करना बंद कर देंगे और हम मशीन बन जायेंगे | श्ने: श्ने , दादी -नानी तो पीछे , बहुत पीछे छुट गयी , चाँद न पीछे छुट जाये | और न बन जाएँ चाँद उबर-खाबर धरती |
Nice line
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हटाएंबहुत खूबसूरत |
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हटाएंChand hmesa aapke sath hi rhega
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हटाएंबहुत खुबसूरत
जवाब देंहटाएंNice
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हटाएंNice one✌
जवाब देंहटाएंGreat punch
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जवाब देंहटाएंGood
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हटाएंVery beautiful thought sir.।..
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हटाएंSuch a beautiful line sir
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