एक व्यक्ति का आँख ख़राब हो गया , उसे अब कम दिखाई देने लगा | आँख शरीर का सबसे महत्वपूर्ण व कीमती अंग है | अतः वह आँख के इलाज़ के लिए एक से बढ़कर एक डाक्टर के पास गया , परन्तु नतीजा धरा का धरा रह गया | फिर उसे एक वैद्य के बारे में पता चला ,जो आँख ठीक करने की गारंटी लेता था |
व्यक्ति को लगा अब उसके आँख की समस्या का निदान होकर रहेगा | व्यक्ति वैद्य के पास गया ,अपनी समस्या से अवगत कराया | वैद्य ने उसे आश्वस्त किया और उसे दो पुडिया दवा का दिया | जिसमे एक पुडिया के दवा को गर्म पानी के साथ खाना था , व दुसरे पुडिया के दवा को आँख में लगाना था |
उस सज्जन ने खाने वाली पुडिया बाएं जेब में रखा और लगाने वाला दाँया जेब में रखते हुए घर चल दिया | एक नई जोश व आत्म विश्वाश के साथ | और कोनसा दवा खाना है ,कोनसा दवा लगाना है ठीक-ठीक याद रहे , उसने " खानेवाला बायाँ में लगानेवाला दायाँ में , खानेवाला बांया में लगाने वाला दाँया में " इस क्रम से बोलते हुए व रास्ता चलते हुए उस व्यक्ति का बोलने का क्रम बदल गया |
अब उसका क्रम " खानेवाला दाँया ,लगानेवाला बांया " हो गया | व इसी याद रहने वाले क्रम के अनुसार दवा का उपयोग कर लिया | और अपेक्षित परिणाम का इंतज़ार करने लगा |
अब आप समझ सकते है , कि उस व्यक्ति का आँख ठीक होने के बजाय और ख़राब हो गया होगा | पुनः अब आप सोचें विचारे - गलती किसकी ?
क्या ! हम भी यही गलती कर रहे हैं | यूँ तो मानव शरीर हीं अनमोल है | और उस अनमोल शरीर को ईश्वर ने भी " दो पुडिया " देकर भेजा है | ताकि हम दुनिया को ठीक ढंग से जी सके , ठीक ढंग से रह सके |
ईश्वर के दिए दो पुडिया में से एक पुडिया - दिल है , दूसरा पुडिया दिमाग है | इन दोनों का उपयोग अगर सही ढंग से होता रहे , तो हमे यंहा कष्ट नही होगा | परन्तु हम कई बार और कितने हीं विश्वास के साथ जहाँ दिल का मामला होता है वहाँ दिमाग को भिड़ा देते है | व दिमाग वाले मामले में दिल को हस्तक्षेप करने देते है |
यानी जहाँ दिल का मामला है , दिमाग से काम लेने लगते है , दिमाग वाले मामले में दिल लगा बैठते है | और फिर कहना पड़ता है " कि जब दिल हीं टूट गया तो जी के क्या करेंगे ?
फर्ज़ कीजिये की ये " दिल-दिमाग ,दिमाग -दिल " का भूल किसी जिम्मेदार व्यक्ति के द्वारा अगर हो , हम-आप सोंच कर हीं सिहर उठेंगे , मसलन ये गलती किसी डाक्टर , इंजिनियर , या अन्य किसी प्रमुख संस्था के नेतृत्व द्वारा हो , तो ये दुनिया , दुनिया न रहकर , कुदरत की सबसे अच्छी नियामत न रहकर एक बेढंग सा बेमन सा किया हुआ कृति रह जाएगी |
दरअसल दुनिया में दिमाग और दिल दोनों का हीं मामला बड़ा हीं संवेदनशील है | और दोनों का क्रम व उपयोग जैसे हीं बदलेगा हम अपेक्षित लाभ तो छोरिये अनापेक्षित हानि के भागीदार होते हैं | और निरर्थक तर्क -कुतर्क करते है | और यही तो है जो हमारे अंदर के सभी कष्टों की जननी होती है |
जिस दिन से हम दिल व दिमाग को स्पष्ट सीमा रेखा पर रखेंगे , ईश्वर पर विश्वाश रहेगा , हम बहुत ही आसानी से , बड़े ही मजे से दुनिया को जी सकेंगे , दुनिया को बना सकेंगे , उसे सम्भाल सकेंगे |
इश्वर के इन "दो पुडिया " जो की जादू वाली है के अलाबे हमे चाहिए क्या ? इश्वर से | एक सुंदर सी दुनिया को देखने और उसकी सुन्दरता में चार -चाँद लगाने की अक्ल के सिवा |
- साकेत बिहारी प्र.कर्ण
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