कल्पना कीजिये , कोई पाँच-छः वर्ष का अवोध लड़का मिट्टी के खिलौना बनाने में मशगुल , ऐसा मशगुल की उस उद्द्य्म के अलाबे उसे कुछ सूझ नही रहा है | कुछ क्षणों में विभिन्न रूप , आकार के कई प्रतिरूप तैयार हो चूका है | अब क्या ? अब वह लड़का अपने बनाये प्रतिरूपों से खुद को मनोरंजित करने को , खेल में फिर उतनी ही तन्मयता से मशगुल | ऐसा मशगुल की फिर उसे कुछ अता -पता नही रहता है | किंतु ये क्या कुछ क्षणों में ही लड़के का चेहरा बता रहा है ,की उसके द्वारा बनाये गये मिट्टी के विभिन्न प्रतिरूप उसके लिए , अब नाक़ाबिल साबित हो रहा है , पुनः अब क्या ?
लड़का पुनः अपने चेहरे पर
संतोष के भाव के साथ प्रतिरूपों को नष्ट कर रहा है ?
ये दृश्य आपके सामने एक ही जवाब उपस्थित करेगा की , बालमन अब खेल से उब चूका है | किंतु ये प्रक्रिया देवो के देव महादेव द्वारा हो , संहारक व सर्जन करता दोनों के रूप में , सुर -असुर दोनों के देव | मिट्टी के प्रतिरूप के वजाय , बुराई जो की व्याप्त रूप में हो , उसके संहार की प्रक्रिया | तो आप क्या कहेंगे -
शक्ति - संतुलन , पर किस लिए ? निरंतर चलायमान रहने को , ये श्रृष्टि ये दुनिया और उसके नियम -कायदे का |
भारत के इतिहाश के समय से साक्ष्य रूप में उपस्थित , अपने कई रूपों, कई नामो , कई मतों में विराजमान आदिपुरुष का आपके हमारे लिए होने की सार्थकता क्या होगी , आज की पृष्ठभूमि में , खुद से खुद को विनाश के कगार पर पहुँचने की लालायित इक्षाओ के समक्ष |
भगवान शिव का होना कई रूप , नाम में होना और उन नामो में कई कहानियो का होना , कई संदेश है आपके -हमारे लिए | पर किस लिए ?
पहला संदेश - एक बार ब्रह्मा और विष्णु में एक-दुशरे में श्रेष्ठ होने की जंग छिड़ी , नतीजा पुरे ब्रह्माण्ड में अराजकता फैलने लगी , अपने निश्चित नियमो से चलने वाली दुनिया अपनी लय खोने को अग्रषर | अब क्या हो दुनिया कैसे चले , कैसे श्रृष्टि की उसके नियमो की लाज बचे | सभी देवता आदिपुरुष के समक्ष नतमस्तक , प्रभु अब आप हीं कोई उपाय करें के विनती के साथ | आदिपुरुष का ज्योतिर्लिंग रूप , शक्ति का ज्योति रूप पर जिसका कंहा प्रारंभ हुआ है , और कंहा अंत है , ब्रह्मा और विष्णु के सामर्थ्य से परे | अब दोनों को एहसास हो चूका था श्रेष्ठता का | शक्ति -संतुलन से श्रृष्टि व दुनिया पुनः एकबार नई गति-मति से जीने की राह पर अग्रसर हुआ |
दूशरा सन्देश - एक बार काली जी बुराई को अंत करते -करते इतनी कुपित हो चुकी थी की दुनिया को हीं नष्ट करने पर उतारू हो चुकी थी , उन्हें भान हीं नहीं रहा की क्या हो रहा है उनसे | दुनिया व श्रृष्टि का एक बार पुनः नष्ट होने की आशंका | देवगण परेशान अब क्या होगा , कौन टोकेगा , कौन रोकेगा काली जी को | यक्ष प्रश्न के समक्ष ,जवाब के रूप में भगवान शिव | देवगण के निवेदन पर पुनः शक्ति के सभी हलचलों से भरपूर महादेव को उपाय सुझा | सभी शक्तियों के उपयोग के वजाय भूमि पर लेटने (समर्पण ) का , काली के रास्ते में पड़ने का | काली संहार करते उसी मार्ग पर आगे , किंतु ये क्या उनसे गलती हो चुकी थी , शिव जी के सीने पर उनका पाँव | दुनिया संहार करने की गलती भी साथ-साथ | अब काली रुक गयी थी , श्रृष्टि और दुनिया पुनः अपने मार्ग पर अग्रसर | पुनः शक्ति संतुलन विना शक्ति के उपयोग के |
तिसरा संदेश - सागर मंथन से विभिन्न कीमती व उपयोगी समग्रियों के अलाबे विष भी निकला | अन्य सामग्री तो उपयोग के अनुकूल विभिन्न देवताओ में बंट गया किंतु विष कौन खपाये | उलटे विष न उन्हें खपा दे | और विष न खत्म हो तो सागर में घुलकर श्रृष्टि का नष्ट होने का प्रश्न पुनः उपस्थित हुआ | पुनः भोले नाथ याद किये गये | नीलकंठ ने सहर्ष विष-पान कर श्रृष्टि को बचाया | शक्ति का उपयोग संहारक शक्ति के विरुद्ध | पुनः शक्ति का संतुलन श्रृष्टि व दुनिया के लिए |
अमावस्या के पहले वाली रात महाशिव रात्रि , उर्जा का उत्तर में मुक्त होने का समय | अपने अंदर के सभी हलचलों से मुक्त होने व बोध को जगाने वाली तिशरी नेत्र को खोलने की रात ताकि उर्जा का , शक्ति का, सम्पन्नता का , सदुपयोग हो सके | अपने लिए , दुनिया के लिए | अक्खड़ -फक्कड बने रहने के लिए ताकि हम सबको एक-समान समझ सके , अपने को शक्तिमान होने की गुमान को भूलते हुए | महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामना |
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Meaning full
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हटाएंBahut khub
जवाब देंहटाएंNice
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हटाएंNice story
जवाब देंहटाएंThanks
हटाएंNice
जवाब देंहटाएंBahut sundar
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