रविवार, 13 मार्च 2022

पैसा बोलता है

 


किसी ने सच हीं कहा है- जिसके पास नहीं है पैसा , उसका जग में जीवन कैसा ? 

           परन्तु गोस्वामी तुलसी दास जी ने कहा है -

 द्रव्य हीन दुःख सहही दुसह अति , 

  सुख   सपनहू    नहीं     पाये     |

 उमय प्रकार प्रेत पावक ज्यों  ,

धन दुखप्रद      श्रुति      गाये  ||

        तुलसी दास जी के अनुसार जिसके पास धन नही है , उसे सपने में भी सुख नसीब नही होता | परन्तु जिसके पास धन है वह भी दुखी ही रहता है , क्योकि उसके माथे पर प्रेत सवार रहता है | 

                 पैसा के वल पर तो लोगो को वोलते आपने वहुतो को सुना होगा पर , क्या कभी पैसा को बोलते सुना है ?

                          हाँ , पैसा भी बोलता है | ध्यान से सुनिये पैसा कहता है - मै भगवान नही हूँ , क्यों मुझे तुम भगवान समझ रहे हो ? मै शैतान भी नही हूँ पर मुझसे तुम एक से बढ़कर एक शैतानी करवा देते हो | मै तुम्हारा ख़ास दोस्त हूँ |जब तुम्हे घर परिवार , सगा -सम्बन्धी यंहा तक की पत्नी , बेटा सभी साथ छोड़ दे फिर भी मै तुम्हारा साथ दूंगा पर ध्यान रखो जब तुम मरने लगोगे तो मै भी तुम्हारा साथ छोड़ दूंगा | मै तुम्हारे लिए तो दवा ला सकता हूँ | पर तुम्हारा आयु मै नही बढ़ा सकता |

           मै तुम्हारे लिए नौकर तो ला सकता हूँ पर सेवक नही ला सकता हूँ | मै तुम्हे पत्नी भी लाकर दे सकता हूँ , लेकिन धर्म-पत्नी मै नही ला सकता | खाने -पीने का सभी सामान ला सकता हूँ , परन्तु भूख मै नही ला सकता हूँ |

सोने के लिए पलंग , गद्दा , तोसक - तकिया सभी दे सकता हूँ , परन्तु नींद मै नही दे सकता | एक से एक वाद्य -यंत्र भी दे सकता हूँ , पर गला  मै नही दे सकता | मै सुख का सभी साधन दे सकता हूँ , परन्तु शांति मै नही दे सकता | मै खुद अस्थिर हूँ तुम्हे स्थिरता कंहा से दे सकूँगा | मेरी अस्थिरता को देखकर हीं कवि रहीम ने कहा है-

                

  " कमला  थिर  न  रहीम  कह , यह जानत सब कोय |

     पुरुष  पुरातन  की   वधु , क्यों न  चंचला   होय   ||

मै कहीं एक जगह स्थिर नही रहता और जंहा थोड़ा टिक जाता हूँ , तो उपद्रव ही मचाता हूँ | मेरे इसी गुण को देख संत कवीर ने कहा है -

         पानी  वाढे नाव में , घर में वाढे दाम |

      तो दोनों हाथ उलीचिये , यही सयानो काम ||

  शायद अब तक तुम मुझे कुछ पहचान गये होगे | अगर नहीं तो मै अपना एक उदाहरण तुम्हे वतला देता हूँ | शायद हीं कोई व्यक्ति हो जो नमक नही चखा हो | मुझे तुम उस नमक के सामान ही समझो नमक के अभाव में सभी व्यंजन फीका रहता है और अधिक नमक पड़ जाय तो व्यंजन का स्वाद जो ख़राब हो जाय | उसी तरह मेरे अभाव में तुम्हारा जीवन ही फीका रहेगा और यदि मेरी अधिकता हो गयी  तो जीवन का स्वाद ही बिगड़ जायगी | अतः मेरा उपयोग उपयुक्त मात्रा में ही होना चाहिए |

               ( प्रस्तुति - साकेत बिहारी प्र० कर्ण )

                

                                                              

             

                     

                                                                         

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