रविवार, 10 अप्रैल 2022

उस युग के राम जगो




हे उस युग वाले राम जगो !

कब तक सिमटे रहोगे एक प्रतिमान में ,

कब तक बंधे रहोगे वेद पुराण में ,

कब तक वाल्मीकि के नायक रहोगे ,

कब तक केकई के पटकथा बनोगे  ,

 कब तक  दशानन का संहार करोगे ,

कब तक मर्यादा की सीमा खींचोगे ,

कब तक राजा बनकर अपने कुटुंब को त्यागोगे 

कब तक त्राशदी के भोगी रहोगे ,

कब तक दुशरो में  भी नायक की भूमिका भरोगे  ,

कब तक जाति भेद मिटाते रहोगे ,

कब तक दुशरो के पक्षधर बन युद्ध लड़ोगे |

 हे उस युग वाले राम , जगो ,

जगो की ऐसे धरा जगे ,

जगो की ऐसे हर एक नर रूप जगे ,

 जगो की ऐसे हर एक राजा-प्रजा जगे ,

नर को नारायण बना देने वाले 

अवध भूखंड से निकलो , महाकाव्य को भेदों 

और भेद दो हर-एक प्रपंच को ,

ताकि नही हो जरूरत एक राम की |

पर जगना ऐसे , जैसे " मै " जागू ,

 एक राम में सबको बाँधने वाले ,

 सब गुण खुद में भरने वाले ,

हे उस युग के राम जगो ! 

राम राज्य आकर लेने को ,

 हर एक  में भर दो राम धुन |

सागर को सेतु से बाँधने वाले |

एक बार बाँधने बढो इस धरा को भी |

ताकि  न हो गुंजाईस  लंकेश की ,

और न  उसके अकथ ,अनथक उत्कंठा की |

हे उस युग वाले राम जगो |

    


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