हे उस युग वाले राम जगो !
कब तक सिमटे रहोगे एक प्रतिमान में ,
कब तक बंधे रहोगे वेद पुराण में ,
कब तक वाल्मीकि के नायक रहोगे ,
कब तक केकई के पटकथा बनोगे ,
कब तक दशानन का संहार करोगे ,
कब तक मर्यादा की सीमा खींचोगे ,
कब तक राजा बनकर अपने कुटुंब को त्यागोगे
कब तक त्राशदी के भोगी रहोगे ,
कब तक दुशरो में भी नायक की भूमिका भरोगे ,
कब तक जाति भेद मिटाते रहोगे ,
कब तक दुशरो के पक्षधर बन युद्ध लड़ोगे |
हे उस युग वाले राम , जगो ,
जगो की ऐसे धरा जगे ,
जगो की ऐसे हर एक नर रूप जगे ,
जगो की ऐसे हर एक राजा-प्रजा जगे ,
नर को नारायण बना देने वाले
अवध भूखंड से निकलो , महाकाव्य को भेदों
और भेद दो हर-एक प्रपंच को ,
ताकि नही हो जरूरत एक राम की |
पर जगना ऐसे , जैसे " मै " जागू ,
एक राम में सबको बाँधने वाले ,
सब गुण खुद में भरने वाले ,
हे उस युग के राम जगो !
राम राज्य आकर लेने को ,
हर एक में भर दो राम धुन |
सागर को सेतु से बाँधने वाले |
एक बार बाँधने बढो इस धरा को भी |
ताकि न हो गुंजाईस लंकेश की ,
और न उसके अकथ ,अनथक उत्कंठा की |
हे उस युग वाले राम जगो |
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Very good sir
जवाब देंहटाएंThanks
हटाएंBeautiful lines
जवाब देंहटाएंThanks
हटाएंNice line
जवाब देंहटाएंThanks
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