कुछ कहने को , कुछ कहलाने में |
कुछ दबा पड़ा है ,सीने के तहखाने में ||
कुछ पाना है ,कुछ लौटाना है |
तेरे जिन्दगी को जीने में |
कभी कमी न था तेरे ठाट में ||
या तेरे सपूतो के समर कौशल में |
कुछ दबा पड़ा है सीने मे |
क्या मै , तुझको लौटा पाउँगा ||
अन्तरिक्ष शून्य से भरते रंग |
सूरज से कुछ पाते रंग |
धरा में बांटते संबुद्ध रंग या,
भरतखंड को जोड़ते मौर्य रंग |
गाँधी सा हिमपति, नेताजी जैसे अभिलाषा |
क्या मै पुनः लौटा पाउँगा ..............
हिमगिरी सा मुकुट तुझको |
उदधि से धुलते पाँव बिभूषण ||
या तुझसे ले लूँगा मै, रक्त रंग |
या जोड़ पाउँगा पुर्वकथा में अपना अंश ||
बहुत कुछ दबा पड़ा है , सीने में |
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जवाब देंहटाएंथकना बुरा भी क्यूं है, रुकने में हर्ज़ कैसा....
Very good
जवाब देंहटाएंThanks
हटाएंVery good
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हटाएंमहाशय बहुत सुन्दर प्रस्तुति है कविता का भावार्थ अनंत है
जवाब देंहटाएंThanks
हटाएंVery very nice sir
जवाब देंहटाएंVery nice 👌👌💚💚
जवाब देंहटाएंVery nice lines
जवाब देंहटाएंThanks
हटाएंबहुत बहुत अच्छा है सर
जवाब देंहटाएंThanks
हटाएंNice line
जवाब देंहटाएंThanks
जवाब देंहटाएंIndeed, 👍🏼👍🏼
जवाब देंहटाएंIndeed
जवाब देंहटाएंVery good sir
जवाब देंहटाएंVery nice.
जवाब देंहटाएंThanks
हटाएंVery nice.
जवाब देंहटाएंSuperb
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जवाब देंहटाएंjai hind
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