मंगलवार, 25 जनवरी 2022

रक्त रंग

 










बहुत कुछ दबा पड़ा है...............

कुछ कहने को , कुछ कहलाने में |

कुछ दबा पड़ा है ,सीने के तहखाने में ||

कुछ पाना है ,कुछ लौटाना है |

तेरे जिन्दगी को जीने में |

कभी कमी न था तेरे ठाट में ||

या तेरे सपूतो के समर कौशल में |

 कुछ दबा पड़ा है सीने मे |

 क्या मै , तुझको लौटा पाउँगा  ||

अन्तरिक्ष शून्य से भरते रंग |

 सूरज से कुछ पाते रंग |

 धरा में बांटते संबुद्ध रंग या,

 भरतखंड को जोड़ते मौर्य रंग |

 गाँधी सा हिमपति, नेताजी जैसे अभिलाषा |

क्या मै पुनः लौटा पाउँगा ..............

 हिमगिरी सा मुकुट तुझको  |

 उदधि से धुलते  पाँव बिभूषण ||

 या तुझसे ले लूँगा मै,  रक्त रंग  |

 या जोड़ पाउँगा पुर्वकथा में अपना अंश || 

  बहुत कुछ दबा पड़ा है , सीने में |

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38 टिप्‍पणियां:


  1. थकना बुरा भी क्यूं है, रुकने में हर्ज़ कैसा....

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  2. महाशय बहुत सुन्दर प्रस्तुति है कविता का भावार्थ अनंत है

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