शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2022

महाश्वेता

  


                                                              धरती अब ठण्ड की चादर उतार फेंकने को उताबली हो रही है ,बहुत हो गया , इस निगोरी ठंड ने तो सबको ,सबको अपने कारागार के  आँगन में सिकुरा कर अपनी मनमानी से तडपाया है |

पेड़ -पौधे भी ठंड की गोद से निकल कर अभी सांस लेने को अलसाये  हुएं है | फूल तो कामदेव से आशीर्वाद पाकर अपनी मनमानी पर उतारू हो चुकी है | भंवरे अपने गुण-गुण की गीत से इनको रिझाएंगे | धरती क्या आकाश भी अब अपना रंग बदलने को मचल रहा है | धरती के संग -संग उसमे भी तरंगे उठ रही है | कोयल तो मानो अपनी मुराद पुरे होने की ढिंढोरा ही पीट रही हो और सबको अपने कुहू -कुहू की गीत से पग्लाने को वेताब  

 है |  क्यों  न हो पागल साल भर तो इंतज़ार करती रहती है ,कभी चाँद को देखकर तो कभी धरती को देखकर दिन बिताई है | पंछियों की टोली ऐसे आकाश में तैरेंगे जैसे हवाओं की सीढ़ी उतरती -चढती हो | कभी सीधी कभी एकदम से बल खाकर एकदम दांये मुडकर उपर -एकदम ऊपर उड़ जाने की होड़ में | सूरज भी अभी अपने नरमी की चादर से हीं सबको आशीर्वाद देंगे | गर्मी अभी कोस भर दूर है | 

           सबमे अभी प्रेम की उमंगे हिलोड़ मारने लगी है | सबके होश अभी -अभी तो उड़कर चकोर बना है  |  मन की गीत बजेंगी | ताल छेड़ने का जिम्मा स्वयं ऋतुराज ने ले रखा है | 

          लेकिन कहीं तो कमी है , कुछ तो छुट रहा है , अधूरापन की बेचैनी तडपाये जा रही है | सबको रचने बाले ब्रम्हा को | हैरान -पड़ेशान | कोयल की गीत पर फूलो की गहने , धरती की अंगराई , आकाश के धरती का होने का तबियत | हवाओं की बारात संग ऋतुराज का नर्तन | सबमे गलती होने की संभवाना है | तो क्या  कारण है उनमे गलती रह जाने की ,  या उनसे गलती होने की | आकाश की तरह साफ़ मन | फिर भी बेचैनी का डेरा ...............

         माघ की शुक्ल पंचमी का दिन | अब बहुत हो गया अपनी बेचैनी की गिरफ्त से निकलने को ब्रह्मा ने अपने कमंडल से धरती पर जल छिड़का | और एक चमत्कार जो बांकी रह गया था | अधूरेपन को पूरा होने का उचित समय आ चूका था | ऋतुराज के गीतों को  संगीत मिलने बाली थी | 

          सरस्वती जी का अवतरण हो चूका है , ब्रह्मा जी के छिडके जल से | सोम्यता , सुन्दरता  की प्रति मूर्ति | ज्ञान - विवेक  को जगाने वाली साबित हुई | ब्रह्मा जी को पुरे होने की सार्थकता प्राप्त हो चुकी थी | और अबतक की बेचैनी व अपने अधूरेपन का कारण भी |

       आइये वसंत का स्वागत करे , कुछ बहुत कुछ धरती की तरह , ब्रह्मा की तरह अपने अधूरेपन को पूरा करें ज्ञान और विवेक से | धरती को नई दिशा दें अपने अंदर के प्रेम-मय गीत से |

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22 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर संदेश। प्रकृति की सबसे खूबसूरत देन बसंत ऋतु।

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