धरती अब ठण्ड की चादर उतार फेंकने को उताबली हो रही है ,बहुत हो गया , इस निगोरी ठंड ने तो सबको ,सबको अपने कारागार के आँगन में सिकुरा कर अपनी मनमानी से तडपाया है |
पेड़ -पौधे भी ठंड की गोद से निकल कर अभी सांस लेने को अलसाये हुएं है | फूल तो कामदेव से आशीर्वाद पाकर अपनी मनमानी पर उतारू हो चुकी है | भंवरे अपने गुण-गुण की गीत से इनको रिझाएंगे | धरती क्या आकाश भी अब अपना रंग बदलने को मचल रहा है | धरती के संग -संग उसमे भी तरंगे उठ रही है | कोयल तो मानो अपनी मुराद पुरे होने की ढिंढोरा ही पीट रही हो और सबको अपने कुहू -कुहू की गीत से पग्लाने को वेताब
है | क्यों न हो पागल साल भर तो इंतज़ार करती रहती है ,कभी चाँद को देखकर तो कभी धरती को देखकर दिन बिताई है | पंछियों की टोली ऐसे आकाश में तैरेंगे जैसे हवाओं की सीढ़ी उतरती -चढती हो | कभी सीधी कभी एकदम से बल खाकर एकदम दांये मुडकर उपर -एकदम ऊपर उड़ जाने की होड़ में | सूरज भी अभी अपने नरमी की चादर से हीं सबको आशीर्वाद देंगे | गर्मी अभी कोस भर दूर है |
सबमे अभी प्रेम की उमंगे हिलोड़ मारने लगी है | सबके होश अभी -अभी तो उड़कर चकोर बना है | मन की गीत बजेंगी | ताल छेड़ने का जिम्मा स्वयं ऋतुराज ने ले रखा है |
लेकिन कहीं तो कमी है , कुछ तो छुट रहा है , अधूरापन की बेचैनी तडपाये जा रही है | सबको रचने बाले ब्रम्हा को | हैरान -पड़ेशान | कोयल की गीत पर फूलो की गहने , धरती की अंगराई , आकाश के धरती का होने का तबियत | हवाओं की बारात संग ऋतुराज का नर्तन | सबमे गलती होने की संभवाना है | तो क्या कारण है उनमे गलती रह जाने की , या उनसे गलती होने की | आकाश की तरह साफ़ मन | फिर भी बेचैनी का डेरा ...............
माघ की शुक्ल पंचमी का दिन | अब बहुत हो गया अपनी बेचैनी की गिरफ्त से निकलने को ब्रह्मा ने अपने कमंडल से धरती पर जल छिड़का | और एक चमत्कार जो बांकी रह गया था | अधूरेपन को पूरा होने का उचित समय आ चूका था | ऋतुराज के गीतों को संगीत मिलने बाली थी |
सरस्वती जी का अवतरण हो चूका है , ब्रह्मा जी के छिडके जल से | सोम्यता , सुन्दरता की प्रति मूर्ति | ज्ञान - विवेक को जगाने वाली साबित हुई | ब्रह्मा जी को पुरे होने की सार्थकता प्राप्त हो चुकी थी | और अबतक की बेचैनी व अपने अधूरेपन का कारण भी |
आइये वसंत का स्वागत करे , कुछ बहुत कुछ धरती की तरह , ब्रह्मा की तरह अपने अधूरेपन को पूरा करें ज्ञान और विवेक से | धरती को नई दिशा दें अपने अंदर के प्रेम-मय गीत से |
**************************
बहुत सुंदर लाइन
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर संदेश। प्रकृति की सबसे खूबसूरत देन बसंत ऋतु।
जवाब देंहटाएंBahut sundar
जवाब देंहटाएंVery good sir
जवाब देंहटाएंThanks
हटाएंNice
जवाब देंहटाएंVery good
जवाब देंहटाएंSuperb.
जवाब देंहटाएंNice
जवाब देंहटाएंUltimate
जवाब देंहटाएंUltimate
जवाब देंहटाएंThanks
हटाएंUltimate
जवाब देंहटाएंGreat
जवाब देंहटाएंNice
जवाब देंहटाएंthanks
हटाएंNice
जवाब देंहटाएं👍👍👍
जवाब देंहटाएंThanks
हटाएंGreat
जवाब देंहटाएंNice
जवाब देंहटाएंThanks
हटाएं