लोग कहते हैं - " संगेदिल के आँखों से आँसू नही निकलते "
अर्थात पत्थर दिल इंसान के आँख सजल नही होते |
परन्तु एक कवि ने लिखा है -" संगेदिल के आँखों से आँसू नही आते ,
अगर ये सच है तो फिर दरिया क्यू निकलती है पहाड़ो से ?
गर्मी का मौसम , दोपहर का समय एक राहगीर को प्यास लगी वह पानी की खोज में बढ़ता जा रहा था | पर पानी कंही दिखाई नही पड़ रहा था | न कंही तालाब न कूआ न नलकूप फिर कंहा मिले जल ?
उसकी प्यास बढती जा रही थी इसमें उसे एक ईमारत का दरवाज़ा अधखुला दिखाई पड़ा , वह बरामदे पर चला गया | धुप से थोड़ी राहत तो मिली पर प्यास उसे वेचैन किये जा रहा था | उसने अधखुले किवाड़ से भीतर की तरफ झांक कर देखा | एक संभ्रांत व्यक्ति जिसकी उम्र पचास -साठ के आस-पास होगी , आराम कुर्सी पर
अधलेटी अवस्था में पलक बंद किये हुए हवा खा रहा था | उसे कुछ आशा हुई उसने हल्के से आवाज़ लगाया - " वावू जी "
इसपर वह घर का मालिक चौंकते हुए बोला -" कौन है , क्या बात है ?
राहगीर ने बड़े प्रेम पूर्वक अपनी कृपा का निवेदन करते हुए कहा - वावू जी बड़ी प्यास लगी है | थोडा पानी चाहिए |
इसपर उस मकान के मालिक ने झल्लाते हुए कहा - पानी चाहिए , यंहा पनशल्ला है क्या, तुम अंदर कैसे आ गये ?
अपनी आशा पर पानी फिरते देखते हुए राहगीर ने , अपनी निवेदन में और करुणा का भाव लाते हुए कहा - " वावू जी , प्यास से जान जा रही है , थोडा पिला दीजिए | "
इस बार उसकी आवाज़ में में काफी करुणा थी तो थोडा रहम खाते हुए कडक आवाज़ में हीं बोला - वैठो वाहर , कोई आदमी आता है तो , पानी पिला देगा |
वह राहगीर पानी की आशा में बाहर बैठ गया , पर उसे प्यास सकुन नही लेने दे रहा था | अतः थोड़ी हीं देर वाद उसने फिर से आवाज़ दे दिया - वावूजी
इसपर डांटते हुए उस घर के मालिक ने कहा -क्यों चिल्ला रहा है ? बोले न कोई आदमी आता है , तो पानी पिला देगा |
राहगीर का सव्र टूट रहा था , फिर उसने जवाब दिया -" वावूजी , थोडा देर के लिए आप हीं आदमी बन न जाइये |"
राहगीर द्वारा कहा गया पंक्ति - "थोडा देर के लिए आप हीं आदमी बन जाइये " क्या हमारे लिए भी एक नसीहत है ? क्या हम भी सर्कस के जोकर की तरह आदमीयत का मुखौटा लगाये अपनी हुनर का प्रदर्शन मात्र तो नही कर रहे है ? इसका जवाब भी हमे ही ढूँढना है , अपने अंदर के उल्फत से |
किसी शायर ने क्या ख़ूब कहा है , हमारी फितरतो के मुकाबिल -
" गुल में गर निकहत नही तो कुछ नही |
दिल में गर उल्फत नही तो कुछ नही ||
आदमी के पास हजारो जौहर हो सही |
पर गर आदमीयत नही तो कुछ नही ||"
( प्रस्तुति - साकेत बिहारी प्रo कर्ण )
*****
Great line
जवाब देंहटाएंबहुत खूब....
हटाएंNice
जवाब देंहटाएंThanks
हटाएंNice
जवाब देंहटाएंThanks
हटाएंThanks
जवाब देंहटाएंGreat
जवाब देंहटाएंBahut khub
जवाब देंहटाएंThanks
हटाएंGreat
जवाब देंहटाएंNice story
जवाब देंहटाएंThanks
हटाएंChandan Kumar
जवाब देंहटाएंCHANDAN KUMAR
जवाब देंहटाएं