रविवार, 27 फ़रवरी 2022

आदमीयत


 लोग कहते हैं - " संगेदिल के आँखों से आँसू नही निकलते "

  अर्थात पत्थर दिल इंसान के आँख सजल नही होते |

                                                       परन्तु एक कवि ने लिखा है -" संगेदिल के आँखों से आँसू नही आते ,

      अगर ये सच है तो फिर दरिया क्यू निकलती है पहाड़ो से ?

                                         गर्मी का मौसम , दोपहर का समय एक राहगीर को प्यास लगी वह पानी की खोज में बढ़ता जा रहा था | पर पानी कंही दिखाई नही पड़ रहा था | न कंही तालाब न कूआ न नलकूप फिर कंहा मिले जल ? 

                                       उसकी प्यास बढती जा रही थी इसमें उसे एक ईमारत का दरवाज़ा अधखुला दिखाई पड़ा , वह बरामदे पर चला गया | धुप से थोड़ी राहत तो मिली पर प्यास उसे वेचैन किये जा रहा था | उसने अधखुले किवाड़ से भीतर की तरफ झांक कर देखा | एक संभ्रांत व्यक्ति जिसकी उम्र पचास -साठ के आस-पास होगी , आराम कुर्सी पर 

             अधलेटी अवस्था में पलक बंद किये हुए हवा खा रहा था | उसे कुछ आशा हुई उसने हल्के से आवाज़ लगाया - " वावू जी " 

 इसपर वह घर का मालिक चौंकते हुए बोला -" कौन है , क्या बात है ? 

राहगीर ने बड़े प्रेम पूर्वक अपनी कृपा का निवेदन करते हुए कहा - वावू जी बड़ी प्यास लगी है | थोडा पानी चाहिए |

इसपर उस मकान के मालिक ने झल्लाते हुए कहा -  पानी चाहिए , यंहा पनशल्ला है क्या, तुम अंदर कैसे आ गये ?

अपनी आशा पर पानी फिरते देखते हुए राहगीर ने , अपनी निवेदन में और करुणा का भाव लाते हुए कहा - " वावू जी , प्यास से जान जा रही है , थोडा पिला दीजिए | " 

 इस बार उसकी आवाज़ में में काफी करुणा थी तो थोडा रहम खाते हुए कडक आवाज़ में हीं बोला - वैठो वाहर , कोई आदमी आता है तो , पानी पिला देगा | 

वह राहगीर पानी की आशा में बाहर बैठ गया , पर उसे प्यास सकुन नही लेने दे रहा था | अतः थोड़ी हीं देर वाद उसने फिर से आवाज़ दे दिया -  वावूजी  

इसपर डांटते हुए उस घर के मालिक ने कहा -क्यों चिल्ला रहा है  ? बोले न कोई आदमी आता है , तो पानी पिला देगा | 

                       राहगीर का सव्र टूट रहा था , फिर उसने जवाब दिया -" वावूजी , थोडा देर के लिए आप हीं आदमी बन न जाइये |"



                                                  राहगीर द्वारा कहा गया पंक्ति - "थोडा देर के लिए आप हीं आदमी बन जाइये " क्या हमारे लिए भी एक नसीहत है ? क्या हम भी सर्कस के जोकर की तरह आदमीयत का मुखौटा लगाये अपनी  हुनर का प्रदर्शन मात्र तो नही कर रहे है ? इसका जवाब भी हमे ही ढूँढना है , अपने अंदर के उल्फत से |

                       

      

                                                


किसी शायर ने क्या ख़ूब कहा है , हमारी फितरतो के मुकाबिल -

            " गुल में गर निकहत नही तो कुछ नही |

               दिल में गर उल्फत नही तो कुछ नही ||

               आदमी के पास हजारो जौहर हो सही |

                 पर गर आदमीयत नही तो कुछ नही ||"

   

               ( प्रस्तुति - साकेत बिहारी प्रo कर्ण )

                                                                        *****


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