दिन ,महीने, साल गुजरते -गुजरते दसक बनते रहे , एक लम्हा समय के परे खींचता रहा ,खींचता रहा और दर्द के सयाने रूप में जिन्दा रहा एक सवाल के रूप में | सिर्फ व सिर्फ एक सवाल | और जवाब के रूप में चुप्पी व चुप्पी और कुछ नही | एक , दो , तीन नहीं पुरे 32 वर्षो की चुप्पी , दर्द सहने वालों की दर्द की दास्ताँ न कह पाने का दर्द कितना गहरा दर्द लिए हुए होगा | केवल एहसास हीं काफी होगा दर्द सहने वालो की | पर क्यूँ ये चुप्पी , वो भी दर्द की दास्ताँ की | कोई तो अपना होना चाहिए, सुनने वाला , समझने वाला ,दर्द बांटने वाला | या कोई नहीं था , दर्द की कालिख के रंग समझने वाला |
पर ये चुप्पी , सभी की चुप्पी , दर्द सहने वालो की, सियासत करने वालो की , सरकार की , सरकार चलाने वालो की , रक्षा करने वालो की | क्यां इसमें किसी का कुछ फायदा था | या की कोई नुकसान | या की दर्द सहने वालो की अहमियत का अभाव | पर क्या ? ऐसा भी हो सकता है , घर के किसी सदस्य को लेकर हमारा आपका रवैया |
पर ये सब हुआ और बड़े ही शान से गाजे-बाजे के साथ ताकि इतिहास भी चुप्पी साध ले भलमनसाहत से | और हम चलते रहें, समाज चलती रहे दुनिया चलती रहे | बेरुखी को कंही अपने अंदर समेटकर | जैसे कुछ हुआ हीं नही हो , या की हम इतने भी निष्ठुर हो सकते है ?
फिर एक सवाल ने जन्म लिया है , सवाल की हीं तरह का सवाल , पर क्या यह भी निरुत्तर रहेगा पहले की तरह ?
खैर दर्द की दर्द वाली दास्ताँ सुनते है , पर यह होगा एक सवाल ही | हमारे लिए , आपके लिए , सियासत के लिए और सियासत करने वालो के लिए |
दास्ताँ की शुरुआत होती है 90 के दशक में कश्मीर में | जन्नत को दोज़ख में बदलने के लिए काफ़ी रहा | सबसे पहले शेख अब्दुल्ला ने अपनी कमज़ोर पड़ती राजनीति के गाँठ को मजबूत करने व दुकान को जिंदा रखने को अल्पसंख्यक कश्मीरी पंडितो को निशाना बनाया और उन्हें वाहरी बताकर भगाने की बात शुरू किया | 1982 में उनके निधन के बाद उनके राजनितिक वारिश फ़ारूक़ अब्दुल्ला भी धीरे-धीरे सीखते रहे | 1984 में गुल शाह CM बने उनके समय में कश्मीरी पंडितो की प्रति नफरत और ज्यादा उभार लेती है | 1986 में पुनः अब्दुल्ला CM बनते है केंद्र के हस्तक्षेप से , 1987 के चुनाव ने कश्मीर के इतिहास को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया | धरती के स्वर्ग का इश्लामिकरण होता गया बड़े ही चुप-चाप से | बिना किसी शोर -शराबे के |
और कश्मीरी पंडित इनके निशाना बनते गये | कारण इनका हिन्दू होना व कश्मीर के सभी गांवो में कम ही संख्या में लेकिन सभी गांवो में होना | ये पढ़े-लिखे मध्यम वर्ग के लोग सरकारी बिभागो में नौकरी करते या अक्सर शिक्षक होते | 1989 में कुछ प्रमुख कश्मीरी पंडित चेहरों को मौत के घाट उतार दिया जाता है | और स्थानीय गांवो के मस्जिदों में लाऊड स्पीकर से फ़रमान सुनाई जाती है | पंडितो के घर छोरने का | और इनके प्रति हिंसा बढ़ जाती है | हत्या , बलात्कार ,आगजनी छिना-जोरी की शिलशिला शुरू होती है |
राज्यपाल बदलने के मसले पर राज्य सरकार एकदिन पहले स्तीफा देती है | खराब मौसम के कारण राज्यपाल कश्मीर नही आ पाते है | इस लचर राजनितिक , प्रशासनिक अव्यब्स्था में 4 जनबरी 1990 की अँधेरी रात एक लम्हा लेकर आती है | और एक हीं रात में लाखो कश्मीरी पंडित घर छोड़ने को मजबूर होते है | घर के वजाय सभी जिलो में बने रेफयूजी कैंप में सुरक्षा मिलने की गारंटी मिलती है | घर को तलाश करते लोग क्या तलाश पाते घर जैसा कुछ चीज शायद बचा हीं नही था | और दर्द को लेकर घूमते संख्या में बंटते कश्मीरी पंडित | जिनका फायदा सभी ने उठाया | लेकिन इनको इन्साफ नही दिला सका |
और इसी पृष्ठ भूमि पर बनी एक फिल्म "द कश्मीर फाइल्स " भी एक सवाल करती - ऐसा क्यूँ ? चुभन , तनाव व घुटन के बीच झूलते फिल्म के युवा पात्र कृष्ण पंडित जैसे पात्र जो अपने साथ ढोता रहता है संशय के बादल को | और एक सवाल को " ऐसा क्यूँ ?
दर्द को बयाँ करती इस फिल्म को भी दर्द से गुजरना पड़ा | और सच्चा -झुटा के तराजू में कभी एक पलड़े में तो कभी दुशरे पलड़े में खड़ा किया जाता रहा | दुनिया फिर बंटती रही , हम बंटते रहे | एक न्यूज़ चैनल के कार्यक्रम में फिल्म के अभनेता अनुपम खेर ने कहा था -सच को सच होने के लिए दो लोगो की जरुरत होती है , एक सच कहने वाला , दूशरा सच सुनने वाला |
फिल्म बनाने वालो ने तो सच कह दिया , क्या हम आप तैयार है एक सच को सुनने , देखने और महसूस करने को |
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Very shameful
जवाब देंहटाएंReality with lives
हटाएंVery correct
जवाब देंहटाएंThanks
हटाएंNise story
जवाब देंहटाएंNice
जवाब देंहटाएंVery nice
जवाब देंहटाएं.
Thanks
हटाएंबहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंThanks
हटाएंTrue story
जवाब देंहटाएंExactly
हटाएंTrue insident
जवाब देंहटाएंBahut sundar
जवाब देंहटाएंThanks
हटाएंDil ke rang aur .........
जवाब देंहटाएंPrem ke rang.
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