मंगलवार, 15 मार्च 2022

कालिख के रंग


                                              

               दिन ,महीने, साल गुजरते -गुजरते दसक बनते रहे , एक लम्हा  समय के परे खींचता रहा ,खींचता रहा और दर्द के सयाने रूप में जिन्दा रहा एक सवाल के रूप में | सिर्फ व सिर्फ एक सवाल  | और जवाब के रूप में चुप्पी व चुप्पी और कुछ नही  | एक , दो , तीन नहीं पुरे 32 वर्षो की चुप्पी , दर्द सहने वालों की दर्द की दास्ताँ न कह पाने का दर्द कितना गहरा दर्द लिए हुए होगा | केवल एहसास हीं काफी होगा दर्द सहने वालो की | पर क्यूँ  ये चुप्पी , वो भी दर्द की दास्ताँ की | कोई तो अपना होना चाहिए, सुनने वाला , समझने वाला ,दर्द बांटने वाला | या कोई नहीं था , दर्द की कालिख के रंग समझने वाला | 

                         पर  ये चुप्पी , सभी की चुप्पी , दर्द सहने वालो की, सियासत करने वालो की , सरकार की , सरकार चलाने वालो की , रक्षा करने वालो की | क्यां इसमें किसी का कुछ फायदा था | या की कोई नुकसान | या की दर्द सहने वालो की अहमियत का अभाव | पर क्या ? ऐसा भी हो सकता है , घर के किसी सदस्य को लेकर हमारा आपका रवैया | 

                                 पर ये सब हुआ और बड़े ही शान से गाजे-बाजे के साथ ताकि इतिहास भी चुप्पी साध ले भलमनसाहत से | और हम चलते रहें, समाज चलती रहे दुनिया चलती रहे | बेरुखी को कंही अपने अंदर समेटकर | जैसे कुछ हुआ हीं नही हो , या की हम इतने भी निष्ठुर हो सकते है ? 

                        फिर एक सवाल ने जन्म लिया है , सवाल की हीं तरह का सवाल , पर क्या यह भी निरुत्तर रहेगा पहले की तरह ?

                     खैर दर्द की दर्द वाली दास्ताँ सुनते है , पर यह होगा एक सवाल ही | हमारे लिए , आपके लिए , सियासत के लिए और सियासत करने वालो के लिए |

           दास्ताँ की शुरुआत होती है 90 के दशक में कश्मीर में | जन्नत को दोज़ख में बदलने के लिए काफ़ी रहा | सबसे पहले शेख अब्दुल्ला ने अपनी कमज़ोर पड़ती राजनीति के गाँठ को मजबूत करने व दुकान को जिंदा रखने को अल्पसंख्यक कश्मीरी पंडितो को निशाना बनाया और उन्हें वाहरी बताकर भगाने की बात शुरू किया | 1982 में उनके निधन के बाद उनके राजनितिक वारिश फ़ारूक़ अब्दुल्ला भी धीरे-धीरे सीखते रहे | 1984 में गुल शाह CM बने उनके समय में कश्मीरी पंडितो की प्रति नफरत और ज्यादा उभार लेती है | 1986 में पुनः अब्दुल्ला CM बनते है  केंद्र के हस्तक्षेप से , 1987 के चुनाव ने कश्मीर के इतिहास को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया | धरती के स्वर्ग का इश्लामिकरण होता गया बड़े ही चुप-चाप से | बिना किसी शोर -शराबे के |

                 और कश्मीरी पंडित इनके निशाना बनते गये | कारण इनका हिन्दू होना व कश्मीर के सभी गांवो में कम ही संख्या में लेकिन सभी गांवो में होना | ये पढ़े-लिखे मध्यम वर्ग के लोग सरकारी बिभागो में नौकरी करते या अक्सर शिक्षक होते | 1989 में कुछ प्रमुख कश्मीरी पंडित चेहरों को मौत के घाट उतार दिया जाता है | और स्थानीय गांवो के मस्जिदों में लाऊड स्पीकर से फ़रमान सुनाई जाती है | पंडितो के घर छोरने का | और इनके प्रति हिंसा बढ़ जाती है | हत्या , बलात्कार ,आगजनी छिना-जोरी की शिलशिला शुरू होती है | 

                      राज्यपाल बदलने के मसले पर राज्य सरकार एकदिन पहले स्तीफा देती है | खराब मौसम के कारण राज्यपाल कश्मीर नही आ पाते है | इस लचर राजनितिक , प्रशासनिक अव्यब्स्था में 4 जनबरी 1990 की अँधेरी रात एक लम्हा लेकर आती है | और एक हीं रात में लाखो कश्मीरी पंडित घर छोड़ने को मजबूर होते है | घर के वजाय सभी जिलो में बने रेफयूजी कैंप में सुरक्षा मिलने की गारंटी मिलती है | घर को तलाश करते लोग क्या तलाश पाते घर जैसा कुछ चीज शायद बचा हीं नही था | और दर्द को लेकर घूमते संख्या में बंटते कश्मीरी पंडित | जिनका फायदा सभी ने उठाया | लेकिन इनको इन्साफ नही दिला सका |

               और इसी पृष्ठ भूमि पर बनी एक फिल्म "द कश्मीर फाइल्स "  भी एक सवाल करती - ऐसा क्यूँ ?  चुभन , तनाव व घुटन के बीच झूलते फिल्म के युवा पात्र कृष्ण पंडित जैसे पात्र जो अपने साथ ढोता रहता है संशय के बादल को | और एक सवाल को " ऐसा क्यूँ ? 

             दर्द को बयाँ करती इस फिल्म को भी दर्द से गुजरना पड़ा | और सच्चा -झुटा के तराजू में कभी एक पलड़े में तो कभी दुशरे पलड़े में खड़ा किया जाता  रहा | दुनिया फिर बंटती रही , हम बंटते रहे | एक न्यूज़ चैनल के कार्यक्रम में फिल्म के अभनेता अनुपम खेर ने कहा था -सच को सच होने के लिए दो लोगो की जरुरत होती है , एक सच कहने वाला , दूशरा सच सुनने वाला |

        फिल्म बनाने वालो ने तो सच कह दिया , क्या हम आप तैयार है एक सच को सुनने , देखने और महसूस करने को |

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