मै ढूंढ़ता अपनी छाया |
कभी दिन में ,कभी रात में ,
कभी जमीं पर , कभी आसमां में |
कभी खुद में , कभी आप में ,
कभी धुप में , कभी छांव में |
कभी मन्दिर में , कभी मस्जिद में,
कभी भगवान में , कभी खुदा में |
मैं ढूंढ़ता अपनी छाया |
कभी ख्वावो के जंगल में ,
कभी अपेक्षाओं के भीड़ में |
कभी गीता के कर्म ज्ञान में ,
कभी कोटिल्य के नीति वाण में |
मै ढूंढ़ता अपनी छाया ,
हाय ! कंही खो गया है ?
या वनवास पा गया है !
कौन कहेगा उसका पता ,
कौन सुनेगा उसकी कथा |
अयोध्या विलाप करे क्यों ?
राम के वनवास का |
दशानन प्रलाप करे क्यों ,
अपने दम्भ शेष का |
कब तक विलाप जननी रहे प्रलाप का ,
मै ढूंढ़ता अपनी छाया |
कंही खुद में हीं तो कैद नहीं है !
कारागार के जंगल में |
जरुरी होगी , उसे बाहर आने की ,
समतल सपाट भूमि की ,
धूमिल रहित निर्बिध्न प्रकाश की |
ताकि आकार ले सके दोष रहित ,
बड़ी सी निर्विकल्प ओजस रूप ,
समतल सपाट , ऊँची ललाट ,
मेरी छाया |
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Nice
जवाब देंहटाएंThanks
हटाएंVery Nice 👌.
जवाब देंहटाएंवाह
जवाब देंहटाएंThanks
हटाएंNice
हटाएंNice line
जवाब देंहटाएंGood line 👍 sir
जवाब देंहटाएंGreat line
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