मंगलवार, 22 मार्च 2022

मै ढूंढ़ता अपनी छाया

 

मै ढूंढ़ता अपनी छाया |

 कभी दिन में ,कभी रात में ,

कभी जमीं पर , कभी आसमां में |

कभी खुद में , कभी आप में ,

कभी धुप में , कभी छांव में |

कभी मन्दिर में , कभी मस्जिद में,

 कभी भगवान में , कभी खुदा में |

 मैं ढूंढ़ता अपनी छाया |
 
कभी ख्वावो के जंगल में ,

कभी अपेक्षाओं के भीड़ में |

कभी गीता के कर्म ज्ञान में ,

कभी कोटिल्य के नीति वाण में |

मै ढूंढ़ता अपनी छाया ,

हाय ! कंही खो गया है ? 

या वनवास पा गया है !

कौन कहेगा उसका पता , 

कौन सुनेगा उसकी कथा |

अयोध्या विलाप करे क्यों ?

 राम के वनवास का |

दशानन प्रलाप करे क्यों , 

अपने  दम्भ  शेष  का |

कब तक विलाप जननी रहे प्रलाप का  ,

मै ढूंढ़ता अपनी छाया |

कंही खुद में हीं तो कैद नहीं है !

कारागार के जंगल में  |

जरुरी होगी , उसे बाहर आने की ,

समतल सपाट भूमि की ,

धूमिल रहित निर्बिध्न प्रकाश की |

 ताकि आकार ले सके दोष रहित ,

 बड़ी सी   निर्विकल्प  ओजस रूप ,

समतल सपाट , ऊँची ललाट ,


     मेरी       छाया  |



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