मंगलवार, 29 मार्च 2022

आवाद परिंदे

   

  ओ उन्मुक्त गगन के आवाद परिंदे ,

   ले   चल  मुझे  भी  संग-संग अपने  |

   जंहा पेड़ो का झुरमुट हो ,

    उसमे छुपते -निकलते  सूरज और चंदा हो ,

    कुछ गिरते ,कुछ उगते  पत्तो में राग हो ,

    हवाओ के संग -संग नदियों का भी गीत हो ,

    भंवरो के गुंजन हो , और तेरे भी अपने हों |

    ओ उन्मुक्त गगन के आवाद परिंदे ,

     ले  चल  मुझे  भी  संग-संग  अपने |
 

    जहाँ फूलो का चादर हो ,

    उस पर  तितलियों का घुमर हो ,

    उनके अटखेलियो -बलखेलियो का संगम हो ,

    सर -सराती हवाओ के शोर में उगते उनमे प्रेम हो |

    ओ उन्मुक्त गगन के आवाद परिंदे |

    ले चल मुझे भी संग-संग अपने ,

    जहाँ चित्रों के न हो तनहाई  तेरे ,

   प्राणमय दिख जाओ तुम वंहा ,

   सुना है वहाँ बादल भी निचे उतरते है ,

   ताल-तलैया भी उसके संग-संग होते है ,

   धरती भी कुछ ऊँचा उठती है ,

  तरु का तरुवर से परिणय होता है  ,

 पहाडो से निकलते पगडंडी पर , प्राणी रोज़ बिचरते है ,

 सुना है देवता भी प्रेमधि बन जाते है |

 ओ उन्मुक्त गगन के आवाद परिंदे ,

ले चल प्रियतम और मुझे भी संग संग अपने |

ओ उन्मुक्त गगन के आवाद परिंदे |

   

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