ओ उन्मुक्त गगन के आवाद परिंदे ,
ले चल मुझे भी संग-संग अपने |
जंहा पेड़ो का झुरमुट हो ,
उसमे छुपते -निकलते सूरज और चंदा हो ,
कुछ गिरते ,कुछ उगते पत्तो में राग हो ,
हवाओ के संग -संग नदियों का भी गीत हो ,
भंवरो के गुंजन हो , और तेरे भी अपने हों |
ओ उन्मुक्त गगन के आवाद परिंदे ,
ले चल मुझे भी संग-संग अपने |
जहाँ फूलो का चादर हो ,
उस पर तितलियों का घुमर हो ,
उनके अटखेलियो -बलखेलियो का संगम हो ,
सर -सराती हवाओ के शोर में उगते उनमे प्रेम हो |
ओ उन्मुक्त गगन के आवाद परिंदे |
ले चल मुझे भी संग-संग अपने ,
जहाँ चित्रों के न हो तनहाई तेरे ,
प्राणमय दिख जाओ तुम वंहा ,
सुना है वहाँ बादल भी निचे उतरते है ,
ताल-तलैया भी उसके संग-संग होते है ,
धरती भी कुछ ऊँचा उठती है ,
तरु का तरुवर से परिणय होता है ,
पहाडो से निकलते पगडंडी पर , प्राणी रोज़ बिचरते है ,
सुना है देवता भी प्रेमधि बन जाते है |
ओ उन्मुक्त गगन के आवाद परिंदे ,
ले चल प्रियतम और मुझे भी संग संग अपने |
ओ उन्मुक्त गगन के आवाद परिंदे |

Nise
जवाब देंहटाएंThanks
हटाएंNice
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