चलते -चलते पहुंचना है कंहा ,
यह भी एक सवाल हुआ क्या ?
ये आगाज़ है , पडाव है या अंत होगा ,
उस सफर का , जिसका हमराही हम-दो हीं रहें |
एक सफर पे एक होने की तमन्ना हुआ क्यों ?
यह भी एक सवाल हुआ क्या !
आँख भी न समेट पाया , खुद बुने सपनों को ,
दर्द कंही और महसूस हुआ क्यों ?
सपनों की चालाकियो से हम क्यू न रहे महरूम ,
यह भी एक सवाल हुआ क्यों !
खुद के बदमाशियों के आगे वेवस हुए क्यों
यह भी एक जवाब हुआ क्या ?
सवालो-जवाबो के सिलसिलो ने भुला दिया था ,
मुहब्बत का मज़ा , ये उस दिन समझ आया .
जब नासमझी की चादर ओढ़ आया था |
हमसफर का सफर अंत पे आया था |
एक बेमतलब की चुटकुले की तरह ,
दरख्तों का साया छोड़ते हवाओ की तरह ,
सौदे बाज़ी सफर की या रिश्तो के तजुर्बे की |
खुशियों की दुकान पर सजी एक वेशकीमती समान की तरह ,
एक और सफ़र और उसके अंजाम क्या होगा ?
यह भी एक सवाल हुआ हुआ क्यों !
चलते -चलते पंहुचना है कंहा !
ये आगाज़ है , पडाव है या अंजाम ,
वाकियो की तरह ये आरज़ू भी दफ्न हुआ क्यों ?

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