मंगलवार, 31 मई 2022

दिलो का सफ़र




चलते -चलते  पहुंचना है कंहा ,

यह भी एक सवाल  हुआ क्या ?

ये आगाज़ है , पडाव है या अंत होगा ,

उस सफर का , जिसका हमराही हम-दो हीं रहें |

एक सफर पे एक होने की तमन्ना हुआ क्यों ?

यह भी एक सवाल  हुआ क्या !

 आँख भी न समेट पाया , खुद बुने सपनों को ,

दर्द कंही और महसूस हुआ क्यों ?

सपनों की चालाकियो से हम क्यू न रहे महरूम ,

यह भी एक सवाल हुआ क्यों !

खुद के बदमाशियों के आगे वेवस हुए क्यों 

यह भी एक जवाब हुआ क्या ?

सवालो-जवाबो के सिलसिलो ने भुला दिया था ,

मुहब्बत का मज़ा , ये उस दिन समझ आया .

जब नासमझी की चादर ओढ़ आया था |

हमसफर का सफर अंत पे आया था |

एक बेमतलब की चुटकुले की तरह ,

दरख्तों का साया छोड़ते हवाओ की तरह ,

सौदे बाज़ी सफर की  या रिश्तो के तजुर्बे की |

खुशियों की दुकान पर सजी एक वेशकीमती समान की तरह ,

एक और सफ़र और उसके अंजाम क्या होगा ?

यह भी एक सवाल हुआ हुआ क्यों !

चलते -चलते पंहुचना है कंहा !

ये आगाज़ है , पडाव है या अंजाम ,

वाकियो की तरह ये आरज़ू  भी दफ्न हुआ क्यों ?



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