मंगलवार, 24 मई 2022

पूरा चाँद


   

कई दिवस  वाद का चाँद ,

उसके खामोशियों की चुप्पी ,

अपने बीते दर्द को छुपाती 

निश्चल व मंद मुस्कान , सौन्दर्य के आसमां में ,

खिलखिलाती उसके वजूद के निशाँ ,

चंचलता को धोका देती ,ऊँचे गगन के बीच में |

लापरवाह किंतु मतलवी सी वादलो के पीछे ,

धीरे -धीरे बढाती आकार , जैसे बढती इक्षाएं |

कमज़ोर पड़ती दिवस को देती दिलाशा ,

साँझ का बढ़ाती होंसला |

किंतु रात आएगी बिराना सा सुना सा ,

पर क्या डरा पायेगी पुरे चाँद को ,

जो करती अटखेलियाँ , अपने यौवन का |

निचे धरती भी टुकुर टुकुर निहारती आकाश ,

जैसे नजरे छुपाती चाँद से , या चाँद के नजर से |

कंही कोई अल्हर रात के वीराने में |

छेरता प्रेम संगीत , दर्द के पतवार से ,

कंही कोई करता इंतजार अपने का  ,

 कोशिश करता ढूंढने की ,चाँद में अपने चाँद की |

एक पुरे चाँद कितने की चाँद होगी ,

सोचकर हीं जलती रहती धरती ,

इसी जलन में कर बैठी गुश्ताखी  ,

 पुरे चाँद को छुपा लिया अपनी छाया में ,

हाय ! चाँद मलिन हो जाएगी , पतित कहलाएगी |

मंद -मंद मुस्कुराता धरती , मलिन कर पाएगा ,

चाँद की यौवन को लगाने दाग ,सफल हो पायेगा |

कर लेने को मनमानी , धरती की इक्षा ,

रोक पायेगी बढती जवानी चाँद की,

क्या घटा पायेगी कोमलता चाँद की ,

या सुन्दरता चाँद की , क्षणिक देर की छाया |

छू पायेगी पुरे चाँद को , होता विकल ,

पाता असफल , गिरता मनोवल ,

होता मलिन ,बनता पतित , केवल सोचकर |

धरती की व्याकुलता तडप रही थी ,

उसके छाया से निकलती पुरे चाँद की छाया ,

उसके षड्यन्त्रो को हराती , जीतती नभ को ,

अपने अरमानो के पंख फैलाती ,

जैसे करती विस्तार अपने साम्राज्य का ,

निश्चल हवा के संग , इक्षा पुरे चाँद की  |

        


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