कई दिवस वाद का चाँद ,
उसके खामोशियों की चुप्पी ,
अपने बीते दर्द को छुपाती
निश्चल व मंद मुस्कान , सौन्दर्य के आसमां में ,
खिलखिलाती उसके वजूद के निशाँ ,
चंचलता को धोका देती ,ऊँचे गगन के बीच में |
लापरवाह किंतु मतलवी सी वादलो के पीछे ,
धीरे -धीरे बढाती आकार , जैसे बढती इक्षाएं |
कमज़ोर पड़ती दिवस को देती दिलाशा ,
साँझ का बढ़ाती होंसला |
किंतु रात आएगी बिराना सा सुना सा ,
पर क्या डरा पायेगी पुरे चाँद को ,
जो करती अटखेलियाँ , अपने यौवन का |
निचे धरती भी टुकुर टुकुर निहारती आकाश ,
जैसे नजरे छुपाती चाँद से , या चाँद के नजर से |
कंही कोई अल्हर रात के वीराने में |
छेरता प्रेम संगीत , दर्द के पतवार से ,
कंही कोई करता इंतजार अपने का ,
कोशिश करता ढूंढने की ,चाँद में अपने चाँद की |
एक पुरे चाँद कितने की चाँद होगी ,
सोचकर हीं जलती रहती धरती ,
इसी जलन में कर बैठी गुश्ताखी ,
पुरे चाँद को छुपा लिया अपनी छाया में ,
हाय ! चाँद मलिन हो जाएगी , पतित कहलाएगी |
मंद -मंद मुस्कुराता धरती , मलिन कर पाएगा ,
चाँद की यौवन को लगाने दाग ,सफल हो पायेगा |
कर लेने को मनमानी , धरती की इक्षा ,
रोक पायेगी बढती जवानी चाँद की,
क्या घटा पायेगी कोमलता चाँद की ,
या सुन्दरता चाँद की , क्षणिक देर की छाया |
छू पायेगी पुरे चाँद को , होता विकल ,
पाता असफल , गिरता मनोवल ,
होता मलिन ,बनता पतित , केवल सोचकर |
धरती की व्याकुलता तडप रही थी ,
उसके छाया से निकलती पुरे चाँद की छाया ,
उसके षड्यन्त्रो को हराती , जीतती नभ को ,
अपने अरमानो के पंख फैलाती ,
जैसे करती विस्तार अपने साम्राज्य का ,
निश्चल हवा के संग , इक्षा पुरे चाँद की |
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