मंगलवार, 7 जून 2022

अतीत की परछाई


 


रेत पर चलने का निशान ,

ढूंढता रहता बच्चा नादान 

ढूंढते-ढूंढते आगे बहुत आगे तक 

उसे पता भी नही ,कितना आगे 

पहुंच चूका वह , बढ़ चूका पहले से आगे 

छुप गई है , या खो गया है 

मिट गया  या मध्धम होगा 

दृश्य होगा  या अदृश्य होगा 

दादा -दादियो के दिखाए रंगीन ख्वावो को लांघते 

बढ़ते -बढ़ते आगे , बहुत आगे |

बड़े हीं अनमने ढंग से बढ़ चूका था वह 

उनका साथ छोरते , थोडा सा खिंजते

थोडा घवराते , कुछ झिझकते 

छुटपन के टोली से निकलते 

पगडंडी पर के मटरगस्ती से बचते 

मास्टर जी के डंडी से कांपते 

तारो की गिनती भूलते , बढ़ चूका वह बहुत आगे 

क्षणिक देर में हीं ऐसे मिलना , जैसे वर्षो वाद मिले 

हमजोलियों से वेमतलव लड़ाई 

भूल चूका था वह सभी हिसाव  

बचपन के जलसे का हिस्सा 

तितलियों के रंगो को हराती 

अक्खर -फक्कर किस्सा , 

 भूल चूका था गहरी नींद में दिखे सपनों की तरह

उनके जादू भरी कसीस के किस्से 

खाली हाथ  खाली मन और क्या जीवन के हिस्से  

खुद के रचे कहानियो के राजकुमार 

आज ढूंढ़ता अपने अतीत के निशान |

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