मंगलवार, 26 जुलाई 2022

कभी आधा कभी ज्यादा ,


होती निरंतर लड़ाई है 

समय चक्र दो पाटो में बंटा पड़ा 

कभी दिन ज्यादा कभी रात आधा 

ख्वाबो के मेले में खींचती लक्ष्मण रेखा ,

होना किसका है , होती निरंतर लड़ाई है 

खुद के आगे भागे या ख्वाबो के पीछे 

या शाम की उदाशी ओढ़ खो जाये एकांतवास में 

इसी द्वंद ने सिखाया  है ,

कभी हम ज्यादा कभी ख़्वाब ज्यादा 

कभी धुप घनी कभी छांव घनी 

कभी पाँव बढ़े कही हाथ बढे 

चलती निरंतर द्वंदों की पुरवाई है 

कभी हम ज्यादा कभी गम ज्यादा 

साँझ की आहट में लौटते परिंदे 

आवाज़ देती हमे चिढाती 

कुछ चाही कुछ अनचाही 

पलो का फिर से दुहराने की तमन्ना 

फिर से किसी गलती की कोशिश तो नहीं ?

या हमारी हस्ती सिर्फ ख्वावो के में कैद में रहेगी 

हमे बताती रात को  गिरते ओस की बुँदे 

एक डाल से दुसरे डाल पर 

दुसरे से तीसरे डाल पर न जाने कितनी डाल पर 

उडती बैठती , आँख दिखाती इक्षाओ के तितली ,

कभी हम ज्यादा कभी ख्वाव ज्यादा 

खुद के आगे भागे या इनके पीछे |



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