रविवार, 5 फ़रवरी 2023

धुंध जो निचे उतर रही .........


कुछ धुंध जो निचे उतर रही ........

अहिस्ता -अहिस्ता जमीं पर गिर रही 

चाँद से  दिखते उनके अक्स को छुपा रही है 

एक मखमली पर्दा गिर रही है ,मन के दरवाज़े पर 

यादें हैं या वादलो के टुकड़े है , 

कुछ धुंध घनेरी फैला रही है ............

अहिस्ता -अहिस्ता जमीं पर उतर रही है 

उनके आँखों के वद्लियाँ भी खो रही है |

यादें हैं या वादलो की मस्तियाँ 

शोखी हैं या गुश्ताखियाँ .............

रूह को छुपा लेने को , यादों के तहखाने में 

कुछ धुंध जो निचे उतर रही है .............

अहिस्ता -अहिस्ता मन के जमी पर फ़ैल रही है 

घूँघट से छुपे उनके अक्स को छुपा रही ,

हल्के पुरवाई में लहराते घूँघट से दिखते 

उनके माथे की कथ्थई  विन्दियाँ को भी नही छोर रही है |

पुरवाई के संग -संग निकले उनके हंसी को छुपा रही है 

किसी बिजली सी कौंधती उनकी हंसी भी ,

दर्द की लम्बी चादर फैला रही है .........

कुछ धुंध जो निचे उतर रही है .............

उनके मनमानियो के वद्लियाँ बहुत कुछ छुपा रही है 

उनके अक्स को छुपा लेने को मचल रही है 

अहिस्ता -अहिस्ता मन के जमीं को ढक रही है |

संग -संग मचलने को तैयार हूँ ,

धुंध संग खो जाने को वेकरार मन 

उनके चाहत भरे क़ैद में गुम हो जाने को 

आँखों की वद्लियों के पानी हो जाने को 

कुछ धुंध जो निचे उतर रही है .......

संग -संग मचलने को तैयार हूँ |



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