सूरज के स्वेत रंग सात रंगो में बदलने को मचल रहे है | धरती भी अब अपना रंग बदलेगी | पेड़ -पौधे भी फूलो और फलों के बिभिन्न रंग में खुद को रंगने की जल्दीबाजी में है | ये विचलन सभी में इसलिए भी जरुरी होता है , की जीवन के गीत निरंतर और निरंतर गाया जा सके |और जीवन के रूप में प्रेम के विशुद्ध गीत बजता रहे | पर क्यूँ ?
गांव के अल्हर ,मतवाले टोली से बचकर भागने की झूटे प्रयास करता युवक कुछ दूर भागकर ,अपने -आप को भीड़ के हवाले कर देता है | और मतवाली भीड़ उसे अपने जैसे रंग में बदल देने को , उसे रंगो से नहा देती है | कोई उस युवक को गिले रंगो से रंग रहा है ,तो कोई उसे सूखे रंग से , तो कोई उसे गले लगा कर ,अपने पन के प्रेम से रंगने को तैयार है , तो कोई अपना दोनों हाथ आकाश की तरफ उठा कर विजय पाने की उल्लास में गीत गा रहा है | मानो जीवन के गूढ़ पहेलियो के जवाब उसने खोज लिया हो | और वह युवक भी रंगो के घोल में घुलते चला जाता है ऐसे , जैसे गीतों को साज़ देते संगीत |
कंही दूर से एक गीत की आवाज़ इस पल को रंगो की नशा में डुबोने को लालायित हो रही है-" गोरिया करके सिंगार ,अंगना में पिसेला हरदिया |"
कुछ पल वाद वह युवक भी अब भीड़ का सदस्य हो चूका होता है | फिर गीत गाता हुआ टोली आगे बढ़ता है -" सदा आनंदा रहे यही दुआरे , मोहन खेले होली हो "
हंसी -ठिठोली करती यह टोली आगे बढती जाती है और रंगो के एकापन से रंगो की भेद मिटाती चलती है , ऐसे जैसे पवन बढ़ते है , दरिया बढती है , जैसे जीवन संग -संग गीत गाती है |लाल ,गुलाबी ,नीला-पिला ,और हरा रंग ,पहचान में अलग हों पर इन बिभिन्न रंगो की खासियत है ,अलग-अलग पहचान होते हुए भी सबके एक ही अर्थ है , और वह है -प्रेम रंग | कुछ पल बाद वह भीड़ किसी घर के सामने रूकती है ," होली है "की शोर उभरती है , और घर की महिलाएं घर के दरबाजे बंद करने की झूटी प्रयास करती हैं | थोड़ी हिल-हुज्जत के बाद दरवाज़ा खुलता है | और रंगो के चादर अपने पाँव पसार देने को उकता बैठती है | स्त्री-पुरुष होने का भेद मिटता है , और उल्लास के गीत सभी के ओंठो पर दस्तक देती है |
ये सब यूँ ही आनंद दायक नही हो रहा है | एक दिन पहले हीं तो सभी ने अपने बेकार पड़े , पुराने और बेमतलब की , बेकाम की आदतों की होलिका जलाई है,और जलाए हैं अपने अंदर के मैल | ताकि नया रंग-रूप मिल सके , जीवन के गीत बज सके , नए अर्थ पा सकें | सब मिलकर कह सकें " बुरा न मानो होली है |" ऐसे जैसे कह रहे हो " बुरा न मानो , जीवन है |"
छोटे-बड़े , बूढ़े -बच्चे सभी तो प्रेम के नशा में मतवाले हो रहे है | कंही कोई भेद होने की सम्भावना भी नही है | प्रकृति भी अभी भांग के नशे में रहना चाहती है | जैसे आज का दिन हीं उनके लिए सार्थक है | और क्यों न हो मतवाले , प्रेम के विना पूर्णता कैसे मिले , रंगो के घोल के विना रंगो के भेद कैसे मिटे ?
आज के दिन तो कर्म के पाठ पढ़ाने वाले कृष्ण भी राधा के प्रेम में जीवन के सुगंध तलाशेंगे | शिव भी पार्वती को पर्व मानेंगे | और अतीत कंही दूर , बहुत दूर छुट जायेंगी | ताकि हम बढ़ सके |
ताकि धरती बढ़ सकेंगी ,जीवन करबट ले सकेगी व उसके गीत बज सकेंगी | सरगम उसके स्वागत कर सकेगी |प्रेम के भाव नृत्य कर सकेंगी | और अनायास हीं शुरू हो सकेंगी जीवन-रंगो की रंगोली | और गहन प्रेम की अभिव्यक्ति |
और रघुवीरा की होली से यह धरा -धाम मगन हो सकेगी | एक रंगो के बोली से न जाने कितने भेद मिटते रहते है , पुरुष में से कोई स्त्री के स्वांग रचते जोगी जी बनता है , तो स्त्रियों के टोली में भी कोई स्त्री पुरुष के स्वांग में कन्हाई बनती है | और आने वाले कल के लिए गीत के स्वर फूटती है ...............जोगीरा ..........सारा ........रा.............रा.....रा .....र्रर्रर्रर |
******
Happy holi
जवाब देंहटाएंHappy holi
हटाएंVery good sir
जवाब देंहटाएंThanks
हटाएंHappy holi
जवाब देंहटाएंHappy holi
हटाएंHoli hai
जवाब देंहटाएंHoli hai
हटाएंHappy holi sir
जवाब देंहटाएंHappy holi
हटाएंVery nice
जवाब देंहटाएंHappy holi dil se
जवाब देंहटाएंHappy holi
हटाएंHappy Holi
जवाब देंहटाएंHappy holi
हटाएंHappy holi
जवाब देंहटाएं