शुक्रवार, 18 मार्च 2022

रंगो की बोली


                                    सूरज के स्वेत रंग सात रंगो में बदलने को मचल रहे है | धरती भी अब अपना रंग बदलेगी | पेड़ -पौधे भी फूलो और फलों के बिभिन्न रंग में खुद को रंगने की जल्दीबाजी में है |  ये विचलन सभी में इसलिए भी जरुरी होता है , की जीवन के गीत निरंतर और निरंतर गाया जा सके |और जीवन के रूप में प्रेम के विशुद्ध गीत बजता रहे | पर क्यूँ ? 

                                            गांव के अल्हर ,मतवाले टोली से बचकर भागने की झूटे प्रयास करता युवक कुछ दूर भागकर ,अपने -आप को भीड़ के हवाले कर देता है | और मतवाली भीड़ उसे अपने जैसे रंग में बदल देने को , उसे रंगो से नहा देती है | कोई उस युवक को गिले रंगो से रंग रहा है ,तो कोई उसे सूखे रंग से , तो कोई उसे गले लगा कर ,अपने पन के प्रेम से रंगने को तैयार है , तो कोई अपना दोनों हाथ आकाश की तरफ उठा कर विजय पाने की उल्लास में गीत गा रहा है | मानो जीवन के गूढ़ पहेलियो के जवाब उसने खोज लिया हो | और वह युवक भी रंगो के  घोल में घुलते चला जाता है ऐसे , जैसे गीतों को साज़ देते संगीत  |
                                कंही दूर से एक गीत की आवाज़ इस पल को रंगो की नशा में डुबोने को लालायित हो रही है-" गोरिया करके सिंगार ,अंगना में पिसेला हरदिया |" 
                        कुछ पल वाद वह युवक भी अब भीड़ का सदस्य हो चूका होता है | फिर गीत गाता हुआ टोली आगे बढ़ता है -" सदा आनंदा रहे यही दुआरे , मोहन खेले होली हो "
                     हंसी -ठिठोली करती यह टोली आगे बढती जाती है और रंगो के एकापन से रंगो की भेद मिटाती चलती है , ऐसे जैसे पवन बढ़ते है , दरिया बढती है , जैसे जीवन संग -संग गीत गाती है |लाल ,गुलाबी ,नीला-पिला ,और हरा रंग ,पहचान में अलग हों पर  इन बिभिन्न रंगो की खासियत है ,अलग-अलग पहचान होते हुए भी सबके एक ही अर्थ है , और वह है -प्रेम रंग | कुछ पल बाद वह भीड़ किसी घर के सामने रूकती है ," होली है "की शोर उभरती है , और घर की महिलाएं घर के दरबाजे बंद करने की झूटी प्रयास करती हैं  | थोड़ी हिल-हुज्जत के बाद दरवाज़ा खुलता है | और रंगो के चादर अपने पाँव पसार देने को उकता बैठती है | स्त्री-पुरुष होने का भेद मिटता है , और उल्लास के गीत सभी के ओंठो पर दस्तक देती है |
                        ये सब यूँ ही आनंद दायक  नही हो रहा है | एक दिन पहले हीं तो सभी ने अपने बेकार पड़े , पुराने और बेमतलब की , बेकाम की आदतों की  होलिका जलाई है,और जलाए हैं अपने अंदर के मैल  | ताकि नया रंग-रूप मिल सके , जीवन के गीत बज सके , नए अर्थ पा सकें | सब मिलकर कह सकें " बुरा न मानो होली है |" ऐसे जैसे कह रहे हो " बुरा न मानो , जीवन है |"
                                       छोटे-बड़े , बूढ़े -बच्चे सभी तो प्रेम के नशा में मतवाले हो रहे है | कंही कोई भेद होने की सम्भावना भी नही है | प्रकृति भी अभी भांग के नशे में रहना चाहती है | जैसे आज का दिन हीं उनके लिए सार्थक है | और क्यों न हो मतवाले , प्रेम के विना पूर्णता कैसे मिले , रंगो के घोल के विना रंगो के भेद कैसे मिटे ?
                                                        आज के दिन तो कर्म के  पाठ पढ़ाने  वाले कृष्ण भी राधा के प्रेम में जीवन के सुगंध  तलाशेंगे | शिव भी पार्वती को पर्व मानेंगे | और अतीत कंही दूर , बहुत दूर छुट जायेंगी | ताकि हम बढ़ सके |
ताकि धरती बढ़ सकेंगी ,जीवन करबट ले सकेगी व उसके गीत बज सकेंगी | सरगम उसके स्वागत कर सकेगी |प्रेम  के भाव नृत्य कर सकेंगी | और अनायास हीं शुरू हो सकेंगी जीवन-रंगो की रंगोली | और गहन प्रेम की अभिव्यक्ति |
                       और  रघुवीरा की होली से यह धरा -धाम मगन हो सकेगी  | एक रंगो के बोली से न जाने कितने भेद मिटते रहते है , पुरुष में से कोई स्त्री के स्वांग रचते जोगी जी बनता है , तो स्त्रियों के टोली में भी  कोई स्त्री पुरुष के स्वांग में कन्हाई बनती है | और आने वाले कल के लिए गीत के स्वर फूटती है ...............जोगीरा ..........सारा ........रा.............रा.....रा .....र्रर्रर्रर |
                                                          

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