कभी किसी रोज़ दोपहर के बाद गर्मी अपने पुरे शवाब पर हो , सूरज के उजले-उजले से किरण लाल-लाल अंगारे बनने को लालायित हो , और हवाएँ भी अपनी नरमी बहुत पहले खो चूका हो | इन सबके साथ धरती की भी मिलीभगत हो और सबके, सब बेरुखी के पुरे आलम में अपनी आँख दिखाने की धमक पर हो | और क्या घर में क्या वाहर में आप कंही भी आरामदायक महसूस नही कर रहें हों , आपके तन की बेचैनी आपके अंदर भी कंही पर पहुँचा हुआ हो और उलझनों की डेरा जमाये हुए हो | और आपके सभी जतन वेवस दिख रहें हों |
ऐसे में कुछ क्षण के लिए कंही दूर देश से आता हुआ एक ठंडी हवा का झोंका आपके शरीर से टकराए ,और आपके रूह को छू जाए | और खाली खाली सा आकाश तुरंत हल्के भूरे रंग के नृत्य करते आवारा बादलो के बारात से भर जाए , और छुपा ले सूरज के तीखे उमस भरी किरणों को | अपने ठंडेपन की जोड़ से | तो ये घटना आपके लिए मुंह मांगी मुराद पुरे होने वाली बात होगी , और आपके अंदर की वेचैन भूत कंही दूर बहुत दूर भाग जायेगी |
पर जरा ठहरिये , कुछ क्षणों बाद पुनः दृश्य बदलता है , और ठंडी हवा के साथ -साथ , भूरे रंग के बादलो के बारात भी आगे , बहुत आगे बढ़ चूका है बिन वर्षा के | आप जिसे अपने आंगन का बारात समझ कर मन को मयूर बना चुके थे , वो बारात तो किसी दुसरे की आँगन का निकला | तब आप और आपके अंदर की वेचैन भूत दोनों देखने लायक होंगे | और आपके कुछ न कर पाने की वेवसी , आपको कंही अंदर तक टीस पहुचायेगा |
पर क्या ? ये वेचैनी , ये आलम और ये विक्रम -बेताल वाली हाल सदा के लिए है , सबके बेरुखी स्थायी है , सभी जतन हमेशा के लिए बेकार साबित होने के लिए होंगे !
हमारे -आपके साथ भी जिन्दगी में कई सारे पल ऐसे हीं होते है , जब हमारे -आपके अंदर भी बेचैनी डेरा जमाये हुए होता है | कभी किसी कारण बस तो कभी अकारण हीं | और होता है कुछ न कर पाने की वेवसी , सबके मतलबी होने के कायदे , ऊपर से विक्रम -बेताल वाली कहानी | कई बार ठगे हुए से होते है कई बार धोका खाए हुए होते हैं | तिस पर किसी की मदद के रूप अस्थाई साथ | लेकिन ये दृश्य आते रहते है , कुछ क्षणों के लिए , कुछ दिनों के लिए या हो सकता है की कुछ वर्षो के लिए भो हों | पर क्यूं ?
शायद इसलिए की हम-आप थोडा ज्यादा गर्मी या विपरीत मौसम या विपरीत परिस्थिति बर्दास्त कर सकने की,उसे झेल सकने की उसे गुज़ार देने की , क्षमता अपने अंदर जगा सकें | सबके बेरुखी को नज़र अंदाज़ कर सकें | और ऐसे क्षण में भी किसी के अस्थायी साथ भी हमको-आपको तकलीफ देने लायक न रहें | हमारे -आपके जतन उस क्षण के लिए वेकार हो सकते है , पर हमेशा के लिए नहीं होंगे ऐसा विचार जाग सकें | और न हमेशा के लिए वेताल , विक्रम के पीठ पर लदने के लिए है , ऐसा समझ पनप सकें | और जाग सकें ये विचार की " वो मौसम भी गया , ये मौसम भी गया | "
और हम-आप धैर्य -पूर्वक , हिम्मत के साथ करते रहे इंतज़ार , कुछ क्षणों का , कुछ दिनों का या कुछ वर्षो का | अपने भी आंगन में आने वाली खुशियों के वारात का | तब कर सकेंगे गीतों के साथ उनका स्वागत , और बन जाने देंगे मन को मयूर | तब हवाओं की नरमी भी अपने होंगे और होंगी उनके रुख | और तब न सूरज की गर्मी हमे रोक सकेंगी | मन को मतवाला बनने से ,और न होगी वेचैनी के भूत और न होंगी विक्रम -वेताल के सवाल जवाब | और छू मन्तर हो जायेंगी वो ......................... |

Very nice
जवाब देंहटाएंBeautiful lines
जवाब देंहटाएंthanks
हटाएंnice
जवाब देंहटाएंThanks
हटाएंNice
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