रविवार, 27 मार्च 2022

वेचैनी के भूत


                   

                                                           कभी किसी रोज़ दोपहर के बाद  गर्मी अपने पुरे शवाब पर हो , सूरज के उजले-उजले से किरण लाल-लाल अंगारे बनने को लालायित हो , और हवाएँ भी अपनी नरमी बहुत पहले खो चूका हो | इन सबके साथ धरती की भी मिलीभगत हो और सबके,  सब बेरुखी के पुरे आलम में  अपनी आँख दिखाने की धमक पर हो | और  क्या घर में क्या वाहर में आप  कंही भी आरामदायक महसूस नही कर रहें हों , आपके तन की बेचैनी आपके अंदर भी  कंही पर  पहुँचा हुआ हो और उलझनों  की डेरा जमाये हुए हो | और आपके सभी जतन वेवस दिख रहें हों |

                                          ऐसे में कुछ क्षण के लिए कंही दूर देश से आता हुआ एक ठंडी हवा का झोंका आपके शरीर से टकराए ,और आपके रूह को छू जाए | और खाली खाली सा आकाश तुरंत हल्के भूरे रंग के नृत्य करते आवारा बादलो के बारात से भर जाए , और छुपा ले सूरज के तीखे उमस भरी किरणों को | अपने ठंडेपन की जोड़ से | तो ये घटना आपके लिए मुंह मांगी मुराद पुरे होने वाली बात होगी , और आपके अंदर की वेचैन भूत कंही दूर बहुत दूर भाग जायेगी |

                               पर जरा ठहरिये ,  कुछ क्षणों बाद पुनः दृश्य बदलता है , और ठंडी हवा के साथ -साथ , भूरे रंग के बादलो के बारात भी आगे , बहुत आगे बढ़ चूका है बिन वर्षा के  | आप जिसे अपने आंगन का बारात समझ कर मन को मयूर बना चुके थे , वो बारात तो किसी दुसरे की आँगन का निकला | तब आप और आपके अंदर की वेचैन भूत दोनों देखने लायक होंगे | और आपके  कुछ न कर पाने की वेवसी , आपको कंही अंदर तक टीस पहुचायेगा | 

                             पर क्या ? ये वेचैनी , ये आलम और ये विक्रम -बेताल वाली हाल सदा के लिए है , सबके बेरुखी स्थायी है , सभी जतन हमेशा के लिए बेकार साबित होने के लिए होंगे ! 

                                                          हमारे -आपके साथ भी जिन्दगी में कई सारे पल ऐसे हीं होते है , जब हमारे -आपके अंदर भी  बेचैनी डेरा जमाये हुए होता है | कभी किसी कारण बस तो कभी अकारण हीं | और होता है  कुछ न कर पाने की वेवसी , सबके मतलबी होने के कायदे , ऊपर से विक्रम -बेताल वाली कहानी | कई बार ठगे हुए से होते है कई बार धोका खाए हुए होते हैं | तिस पर किसी की मदद के रूप अस्थाई साथ |  लेकिन ये दृश्य आते रहते है , कुछ क्षणों के लिए , कुछ दिनों के लिए या हो सकता है की कुछ वर्षो के लिए भो हों | पर क्यूं ? 

                                                       शायद इसलिए की हम-आप थोडा ज्यादा गर्मी या विपरीत  मौसम या विपरीत परिस्थिति  बर्दास्त कर सकने की,उसे झेल सकने की उसे गुज़ार देने की , क्षमता अपने अंदर जगा सकें | सबके बेरुखी को नज़र अंदाज़ कर सकें  | और ऐसे क्षण में भी किसी के अस्थायी साथ भी हमको-आपको तकलीफ देने लायक न रहें | हमारे -आपके जतन उस क्षण के लिए वेकार हो सकते है , पर हमेशा के लिए नहीं होंगे ऐसा विचार जाग सकें | और न हमेशा के लिए वेताल , विक्रम के पीठ पर लदने के लिए है , ऐसा समझ पनप सकें | और जाग  सकें ये विचार की " वो मौसम भी गया , ये मौसम भी गया | " 

                                  और हम-आप धैर्य -पूर्वक , हिम्मत के साथ करते रहे इंतज़ार , कुछ क्षणों का , कुछ दिनों का या कुछ वर्षो का | अपने भी आंगन में आने वाली खुशियों के वारात का  |  तब  कर सकेंगे  गीतों के साथ उनका स्वागत , और बन जाने देंगे मन को मयूर | तब हवाओं की नरमी भी अपने होंगे और होंगी उनके रुख | और तब न सूरज की गर्मी हमे रोक सकेंगी | मन को मतवाला बनने से ,और न होगी वेचैनी के भूत और न होंगी विक्रम -वेताल के सवाल जवाब | और छू मन्तर हो जायेंगी वो ......................... |

                          

                

6 टिप्‍पणियां: