मंगलवार, 5 अप्रैल 2022

नोटबुक


                                        कभी -कभी इंसान घर का पता नही , घर खोजता रहता  है , तो कभी-कभी अपनो  को नहीं , अपनेपन का भाव पहचानने की कोशिस करता रहता है | और कभी कभी या अक्सर इंसान का  बेमतलब रास्ते पर चलना भी उसे मतलब की चीजें दिखा जाती है , सिखा जाती है |

                        मोहन वावू के चेहरे पर कभी खुशियों के भाव अपने निशान बना देती तो कभी -कभी हैरानी , व दर्द की रेखा भी उभार ले लेती | लेकिन कुल मिलाकर उनके चेहरे पर एक रोमांचक व सुखदायक ख़ुशी का भाव कुछ ज्यादा मात्रा में है | अंदर से दिल की धडकनों की गवाही उन्हें सुकून दे रहा है | इन्ही खट्टे -मीठे एहसासों का सफर करते -करते आज उनका मंजिल 22 घंटे की ट्रेन की सफर 26 घंटे में पुरे होने पर निकट आ गया था | लम्बी व उबाऊ यात्रा का थकान उनके चेहरे पर अपने निशान बना पाने में पुरी तरह से नाकामयाब साबित हो रहा है | 
              
                          पुरे 15 वर्षो के बाद असीम अनुकम्पा वाली यात्रा जो है उनके लिए | भुख -प्यास ,ट्रेन की भीड़ भाड़ वाले उमसती हुई दुर्गन्ध वाली गर्मी भी आज उनके लिए सुखदायक है | खिड़की से झांकते उनके जोड़े आँखों में भागते पेड़ो , खेतो , मकानों के साथ उनकी यादें भी 15 साल पीछे भागने लगी है | और वें वेवस सा उन दिनों में पहुँच जाते है ,जिसका कुछ रंग  सुनहरे है | तो कुछ मटमैले  रंग का तो कुछ गहरे धूसर रंग वाली यादे है | जो खुले आँखों से होते हुए दिलो-दिमाग को अपने गिरफ्त में लेने को उकता रही है | और उनके ओंठो पर कभी रोमांच के रंग भरती है तो कभी वेवसी के | कभी उनके आँखों में एक पतले पानी की डोरे कलाबाजियाँ करती है | तो कभी ख़ुशी की लहरे दिख जाती है | इन्ही ख्यालो में डूबे मोहन वावू को ट्रेन की गति को कम करने हेतु लगे ब्रेक के कारण ट्रेन के झटके व हॉर्न ने जगाया | वें अपनी सामानों को लेने भागते कदमो से अपने सीट पर गये कुल जमा एक बैग व एक ब्रीफकेश में उनकी जरुरतो के सामान भड़े परे थे | बैग को  बांये कंधे पर टांगते हुए ब्रीफकेश को दांये हाथ में पकडे दरवाजे की तरफ जोर से भागे , जैसे अभी न भागे तो ट्रेन भाग जायगी |
                 
        
                                            कितना कुछ बदल गया है इन बीते 15 वर्षो में , एक छोटा सा स्टेशन एक बड़े स्टेशन में बदल गया है , स्टेशन तक आने बाली  कच्ची पगडंडी एक ऊँचे व साफ सुथरे कंक्रीट के बड़े से रास्ते में तब्दील हो गया है , सडक के दोनों तरफ के सजीले व चमकदार दूकान तो बचपन के मेला बाले दिन की याद दिलाती है | बहुत कुछ बदल गया है ,और भागते समय के रंग ने इनमे कई रंग भर दिया है | इन सब के साथ कितना कुछ बदलाव उनमे भी आ गया है , तब का एक मन्मतंग किशोर का मन मर्जी बड़े -बुजुर्गो के लिए आवारागर्दी कहलाती थी , नाना -नानी के यंहा पला बढ़ा एक युवक जिसकी मटरगस्ती सारे गाँव में बदनाम थी | लेकिन इन सबके साथ उस किशोर की जान पहचान अपने उम्र के लडको के साथ -साथ बड़े -बुजुर्गो में भी एक-सामान थी | कारण एक हंसमुख स्वभाव ,बिन मांगे मदद को तैयार और हाल -चाल तो वह राह चलते लोगो से भी पूछा करता  | आज एक धीर -गम्भीर नोटबुक बन गया है , जिसमें बदलते समय ने  बहुत सारे सवालों के जवाब भर दिया है |
                                                                           
                                                                          एक गहरी सांस लेकर गम्भीर होने की मुद्रा में उन यादो से बाहर निकलने की जद्दोजहद में मोहन वावू टैक्सी पकड़ने भागते है | स्टेशन के दरवाजे पर हीं चार-पाँच टैक्सी वालों ने उन्हें घेर लिया और उनमे से किसी ने जबरदस्ती उनसे ब्रीफकेस अपने हाथ में लेने की कोशिश करता हुआ सवाल दागता है -कंहा जाना है वावुजी | मोहन वावू सभी को फटकारते व भगाते हुए सभी से छिटकते दूर भागते है | थोरा दूर एक चाय के स्टाल के पास रुकते है एक पानी को बोतल खरीदते है | दो-चार घूंट पानी पीने के बाद दो-चार पानी की छींटे अपने चेहरे पर डालते हुए हल्के होने की कोशिस करते है | तभी एक टैक्सी वाला उनके पास अपना टैक्सी रोकते हुए पूछता है - कंहा जाना है | 
     
                       " कंहा जाना है " इन शब्दों ने उनके पास एक गम्भीर सवाल खड़ा किया है , उनके सामने | जिसका जवाब फिलहाल तो उन्हें भी मालुम नही है | कंहा जाना है उन्हें - जंहा उन्होंने जन्म लिया और छुटपन के अभाव भरे दिनों में भी   माँ-बाप और तीनो भाई के साथ साथ हंसी ठिठोली में जिया था | बहुत कुछ मटमैली यादे है उनमें अपने  गाँव के | फिर छुटपन में हीं पिता का साया सर से उठते हीं नाते -रिश्तदारो द्वारा मुंह फेरना | और वेवस माँ का अपने बच्चो के साथ नाना -नानी के यंहा आ जाना | फिर एक नई शुरुआत जिन्दगी की ,नया गाँव , नया पगडंडी, नया खेत -खलिहान और नया -नया आम का बगीचा छुटपन बाले मोहन को मुश्किल नही हुआ पिछले दिनों को भूलने में |  नया स्कूल और नए दोस्तों ने उन्हें बहुत दूर पहुँचा दिया था | नाना -नानी का प्यार कुछ विशेष नसीब हुआ उनको कारण सबसे छोटा होना , और निश्चल शैतानी भरा दिमाग तिस पर मुस्कुराता हुआ चेहरा | समय ने सुनहरा पन्ना जोड़ा था उस वक्त उनके नोटबुक में | किंतु कहते है समय का पंख होता है , वह चालाकी से उड़ जाता है , किसी को अपने संग ले उड़ता तो तो किसी को पीछे , बहुत पीछे छोर जाता है |

                     पहले नानी का देहांत हुआ उसके कुछ  दिनों बाद नाना भी गुजर गये | एक बार फिर से उनके माँ और भाइयो के बीच सवाल उभरा - अब क्या होगा ? कैसे दिन काटेंगे ? कैसे , कैसे और कैसे जैसे कई सवाल नोटबुक में जवाब मांग रहे थे | मामा -मामी के व्यवहार में अचानक आये परिवर्तन ने उनके बड़े भाई के स्थान परिवर्तन में भूमिका बखूबी निभाया | उसके कुछ दिनों बाद मंझले भाई भी कूच कर गये घर के रोजी-रोटी में हाँथ बंटाने को | उनको पढाई जारी रखने को कहा गया | हाई स्कूल की पढाई पूरा करते हीं उनके मन में भी आया अब बहुत हो गया | अपने को भी कुछ करना चाहिए | दोनों भाई के पास पहुंच गये अपने माँ के साथ | फिर से एक नई शुरुआत बहुत सारे सवालों के साथ | एक अनजाने देश में जिसमे सबकुछ तो अनजाना हीं था | खैर शुरुआत हुआ और उस शुरुआत ने एक मुकाम भी पाया | 
  
                                               15 वर्षो की तकरीर ने बहुत कुछ बदल जरुर दिया | लेकिन नहीं बदला  तो एक सवाल " घर कंहा है ? "

                    बरबस उनके ओंठो पर एक वाक्य स्वर रूप  में उभरता है - कंहा जाना है ? टैक्सी ड्राईवर हॉर्न बजाता हुआ , जोर से चिल्लाता हुआ  बोलता है - पगला कंही का | और टैक्सी चलाता हुआ आँखों से ओझल हो जाता है | मोहन वावू एक गहरी सांस लेते हुए अपने नोटबुक से सवाल मिटाते हुए , इत्मिनान से एक रिक्शा पर बैठते है ,और बगल के गांव चलने को उसे आज्ञा देते है | वंहा उनके बड़े भाई का सशुराल है |


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