मतवाला था वह !
रोते आँखों को पोंछते , भागा था |
बेहिसाब ,जंहा तक भाग सका ||
अपने हिसाब से बहुत दूर ,
हाथ छुराकर , पाँव बचाकर |
नजरें बचाकर , खुद को छुपाकर ||
जंहा तक भाग सकता वह ,
रोते आँखों में भागने के सपने कैसा ?
भूत पीछे लगने जैसा |
कुछ खांसते ,कुछ हाँफते ,
कुछ हिचकते , कुछ बहकते |
भागते पैरों पर , भागा था वह |
अपनी माँ के गुस्से से डर कर ,
रोने का नाटक ,सीने में सैतानी भरकर ||
मतवाला था वह !
रोते आँखों को पोंछते ,भागा था |
कुछ कच्चे , कुछ पक्के घरों के ,
एक छोटे से गाँव के आगे पग डंडी पर |
बेहिसाब जंहा तक भाग सका वह ||
और धरती ने भी छुपा लिया था ,
भागते पैरो के उसके निशान |
हल्के पैरों के निसान ,हल्की हीं होगी ||
किंतु उसे क्या पता था , धरती की सीमा |
भागते -भागते , हाँफते -हाँफते |
कंहा तक भगा सकता था !
उसके नन्हे कदमों की ताकत |
गिरकर हंसना , हंसकर बैठना ||
क्या उसकी जीत है ?
मतवाला था वह !
भागने को क्षणिक भागा था |
उसे कंहा पता था ,आफत धरती पर हीं नही ,
आसमान से भी टूट सकता है !
उसकी माँ की पंहुच से पहले ,
बारूद के गोला गिर सकता है |
धरती की मासूमियत मिट चूका था ,
बारूद के संग उसके पाँव के निसान उग चूका था |
मतवाला था वह !
जंहा तक भाग सकता , भागा था वह ???
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Nice poem
जवाब देंहटाएंNice poem sir
जवाब देंहटाएंThanks
हटाएंসুন্দর অনুভূতির সৃষ্টি
जवाब देंहटाएंThanks
हटाएंGreat
जवाब देंहटाएंThanks
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