कुछ धुंधला , कुछ उजला सा ,
कुछ मतलवी , कुछ लापरवाह सा ,
कुछ चटख , कुछ मटमैला सा ,
कुछ रेशमी , कुछ खद्दर सा ,
मेरे मन निकल सको ,
तो निकलो , ख्वावो के अतरंगी मेले से |
कुछ - कुछ दिन् रात के संगम सा ,
कुछ - कुछ इश्क के परवाज़ सा ,
कुछ - कुछ चाँद के आगे खड़े जंगल सा ,
कुछ -कुछ पहाड़ो को पाटते - गिरते दरिया सा ,
कुछ - कुछ कली से बनते फूल सा ,
कुछ - कुछ कोंपल से बनते दरख्त सा ,
मेरे मन निकल सको ,
तो निकलो ख्वावो के अतरंगी मेले से |
जैसे चाँद व सूरज निकलते विपरीत परिवेश से ,
एक ने खुद को जलाया तो रोशन कर पाया दिवस् को ,
दूजे ने खुद को तपाया तो , महका पाया निशा को ,
मेरे मन निकल सको तो निकलो |
कुछ धरती , कुछ अम्वर सा ,
कुछ पतझर , कुछ वसंत सा ,
कुछ अग्नि , कुछ धनंजय सा ,
कुछ वायु , कुछ पानी सा ,
कुछ कोमल , कुछ कठोर सा ,
कभी प्रेम तो कुछ इर्ष्या सा ,
मेरे मन निकल सको तो निकलो ,
ख्वावो के अतरंगी मेले से !
सुना है , आज भी तलाश है चाणक्य को
एक चक्रवर्ती राजा की ,
जो पहले खुद को जीते ,तो जीत सके !
जो बना सके अपने कमजोरी को ताकत !
जो गढ़ और सज़ा सके , दुनिया व दुनियादारी को |
मेरे मन निकल सको तो , निकलो ,
एक अनजानी , तिलिस्मी दुनियाँ से ,
मै हीं मिल जाऊ , विष्णुगुप्त को उसके सांचे में |
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Nice example
जवाब देंहटाएंVery Nice Sir 👍
जवाब देंहटाएंNice one more
जवाब देंहटाएंthanks
हटाएंNice ones
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