रविवार, 26 मार्च 2023

खामोश आवाज़े


 हर तरफ , हर किसी ने मचा रखा है शोर 

फिर क्यू उदाश है , ख़ामोशी की फितरत 

कभी तन्हा हम रहते है , कभी वो तन्हा 

चुपके से आने वाली -फु-फुसाहट के शोर 

तन्हाई से दूर खिंच  ले जाती है भोर 

मन के कंही अंदर से निकलती है -

खामोश आवाज़े , छटपटाकर रख देती है ,

रात-दिन के मिलन का शोर 

हर किसी में भागने की होड़ 

तनहाई से दूर खिंच ले जाती है भोर ,

किंतु बाहर पसरा बेतरतिव ख़ामोशी 

मुलायम चादर के बाहर ले जाती है उसके पैर 

रात की ख़ामोशी समझ आती है , किंतु 

भोर की ख़ामोशी , जगा जाती है 

वह दुख किसका मनाये , सपनों का छुट जाने का 

या सपनों को हकीक़त में बदलने का 

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