हर तरफ , हर किसी ने मचा रखा है शोर
फिर क्यू उदाश है , ख़ामोशी की फितरत
कभी तन्हा हम रहते है , कभी वो तन्हा
चुपके से आने वाली -फु-फुसाहट के शोर
तन्हाई से दूर खिंच ले जाती है भोर
मन के कंही अंदर से निकलती है -
खामोश आवाज़े , छटपटाकर रख देती है ,
रात-दिन के मिलन का शोर
हर किसी में भागने की होड़
तनहाई से दूर खिंच ले जाती है भोर ,
किंतु बाहर पसरा बेतरतिव ख़ामोशी
मुलायम चादर के बाहर ले जाती है उसके पैर
रात की ख़ामोशी समझ आती है , किंतु
भोर की ख़ामोशी , जगा जाती है
वह दुख किसका मनाये , सपनों का छुट जाने का
या सपनों को हकीक़त में बदलने का

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