ख़्वाब को कभी -कभी पुरे होते हुए जागना | कभी कभी बीच ख़्वाब में नींद से जगना | कभी-कभी एक मीठा सा एहसास करा जाती है, तो कभी -कभी दर्द की एक धुंधली सी रेखा खिंच जाती है, आपके चेहरे पर | कभी -कभी ख्वाबों में रहने के लिए..... .................सदा के लिए .......................एहसास करा जाती है, ये अतरंगी ख्वाबें |
सुन्दरम ,शानू ,नौटंकी नामो से प्रचलित अपने मम्मी -पापा के लिए शायद एक ख़्वाब ही था | जिसकी एहसास आज तक बरक़रार है ,बिलकुल खुश्बू की तरह |
हवा में खुश्बू की फितरत होती है की जितने वह हमसे दुर होती जाती है , उतनी ही अपना होने की एहसास कराती रहती है ,
तो अपने आपको हवा में खो जाने का दर्द भी देती रहती है |
खैर बात सुन्दरम की ,एक छोटा सा ,नन्हा सा गोरा -चिट्टा ,घुंघराले बालो वाला लड़का जो अपनी पनीली आँखों से व आँख के ऊपर भौवो से ही शरारत करने के लिए जाना जाता था | जिसकी आँखों में सारे जहाँ की बाल -मन में उठने वाली शैतानियों का रेला आया -जाया करता था | जो शायद समझ भी चूका था, हाथ -पाँव के बदले आँखों से ही शरारत कर सकता है वह |
जो डाक्टर से लेकर कई अजनबियों के नज़र में लड़की होने का भ्रम देता रहता , उसको हम अपने जिन्दगी के सपनो में कौन-सा सपना कहें या हकीक़त जो अब ख़्वाब बन चूका है , जिसकी खुश्बू आज भी यादों की वादियों में परवाज़ करती है |
अंतर्द्वंद में एक माँ , एक पिता | दोनों का ऐसा ख्वाव जो सुनहरी रेत की पृष्ठ-भूमि पर सुनहरे सूर्य-किरण से
चमकता, आँखों को धोका देने वाली एक मृग-मरीचका जो आँखों को सुकून तो देती है , मन में अपने को सच्चा होने का भ्रम भी |
उस भ्रम की स्थिति में एक अस्पष्ट सा चित्र !
चित्र से याद आया ......... अगर, उस बच्चे का चित्र केनवास पर उतारी जाय तो , हु-ब-हु उसके माँ से मिलता जुलता तस्वीर उतर जायगी | विडंबना देखिये की हमारे यहाँ एक कहावत प्रचलित है " जिस लड़की का चेहरा -शुरत अपने पिता पर होती है ,वह भाग्यशाली होती है ,उसी तरह जिस लडके का चेहरा -शुरत अपने माँ पर गया हो ,वह भाग्य -शाली होता है |"
ये कहावत है , मुझे तब समझ में आया जब उसे हकीकत समझ या की अपने जिन्दगी का हिस्सा या की एक अधूरी ख़्वाब ? निर्णय लेने में एक बाप का दिल ,एक माँ का दिल असमर्थ सा , बेवस सा था | जैसे रेगिस्तान में छाया ढूंढ़ता हुआ कोई राहगीर मीलों चलकर ,खजूर पेड़ के पास पहुँचने की ख़ुशी मनाये | तब आप उसे क्या कहियेगा ! स्वप्नजीवी या वास्तविकता के बीच फँसा इन्सान |
जो मर्ज़ी .................................... पुकार लीजियगा |
किंतु एक हकीक़त ........जब देश के नामी- गिरामी अस्पतालों में से एक राजधानी की अस्पताल के डाक्टर द्वारा जब उस नन्हे सी जान को " खाली डब्बा " करार दिया जाय | शांत होती शहर की चकाचौंध में रात की अंतिम मेट्रो पकड़ने भागती चार जोड़े पावों को रोकती , कानों में गूंजती डाक्टर की आवाज़ ........" ये खाली डब्बा है,आप-दोनों दुशरे बच्चे की तयारी करो " |
रोते हुए आँखों में भी ख़्वाब दस्तक दे जाती है | अस्पताल से मेट्रो स्टेशन तक हम-चार लोगो (उसके नाना -नानी भी थे ) में कोई बात-चित नही | मानो मध्यम होती शहर की रौशनी , व्यस्त रहने वाली शहर की शांत होती कोलाहल , सभी का साथ मिल रहा हो |
उस पल को बोझिल बनाने ,व इस पल में भी, उसके माँ-बाप को फिर से एक सपना बुनने का |
एका-एक उस बोझ बने पल को भंग करती उसके माँ की आवाज़ जो मुझसे से मुखातिब था " मै इसे ठीक , करके रहूंगी " मेरा रुआंसे व भरे गले से शिर्फ़ ' हूं " का प्रति -उत्तर |
इन सारी बातो से बेपरवाह बच्चा अपने बाप के सिने में सिमटा -लिपटा कंधे पर झूलता हुआ गहरी नींद में मगन सोया हुआ था | उसे क्या पता था डाक्टर के बातो का अर्थ ,उसे क्या लेना था " खाली -डब्बा " जैसे शब्दों से | अच्छा ही था की वह डाक्टरी भाषा से अनजान था ,नही तो उसके भी आँखों में एक नन्हा सा ख़्वाब तैरता " स्वास्थ्य होने " का ख़्वाब | उसकी वे-जान सी हाथ -पाँव के साथ एक निढाल सा शरीर पर एक हँसता हुआ सा चेहरा , उसकी आँखे ही प्यार , गुस्सा ,हंसी -मजाक की शरारती भाव बयाँ कर सकती थी | उस खाली सा डब्बे का हम -दोनों के जिन्दगी में क्या महत्व था , उसके गये कई -बर्षो बाद भी जवाब नही मिल पाया है !
उसे अपने गोद में लिए एक दिन मै , गाना गा रहा था " तुझे सूरज कहूँ या चंदा .....
दीप कहूँ या तारा ......................" | आज तारों के बीच उसे ढूंढने का झूठा सा कोशिश करता बाप | व अपने कोशिस को छुपाती एक माँ |
डाक्टर के अनुसार वह सेरेब्रल -पाल्सी से पीड़ित था | जिसका उपाय शिर्फ़ -व शिर्फ़ एक माँ-बाप के लिए दुसरे बच्चे की तैयारी करना है | डाक्टर की सलाह अच्छी हो सकती है | एक माँ-बाप के सपनों से सज़ा पहले बच्चे के बारे में अनगिनत ख्वाबों के बीच फंसे दो आँखों के जोड़े का दर्द या बेवसी का क्या कीजियेगा | जिसे भोर का ख़्वाब भी नही कह , सकते | एक दिन यूँ ही ठण्ड की अँधेरी रात को चीरते हुए ,सूरज अपने आ धमकने की ज़िद्द पर अड़ा हुआ था ,उसके लाव-लश्कर आकाश में चारो तरफ सूरज के साम्राज्य के विस्तार करने में एक सुहावना सा वाताबरण का निर्माण , व सुवह होने की भरोशा दिला रहे थे ,किंतु कुहांसे के बीच फँसे दम तोरती उनके प्रयाश |उन्ही पल में वह नन्हा सा जान अपने अंदर के दर्द को अपने सूर्ख पड़ चुके व उनींदी सी आँखों के बीच सदा के लिए छुपाने की कोशिस में कामयाब हो चूका था | ठण्ड की ही रात को चीरकर आते हुए भोर में आया था वह |
एक पन्ना पलट चूका था ,एक हिस्सा बीत चूका था | हम-दोनों के ज़िन्दगी का | आज वह होता तो उसकी माँ उसके जन्म -दिन की आंठ्वी वर्ष-गांठ मनाने की तैयारी कर रही होती |


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