रविवार, 26 मार्च 2023

खामोश आवाज़े


 हर तरफ , हर किसी ने मचा रखा है शोर 

फिर क्यू उदाश है , ख़ामोशी की फितरत 

कभी तन्हा हम रहते है , कभी वो तन्हा 

चुपके से आने वाली -फु-फुसाहट के शोर 

तन्हाई से दूर खिंच  ले जाती है भोर 

मन के कंही अंदर से निकलती है -

खामोश आवाज़े , छटपटाकर रख देती है ,

रात-दिन के मिलन का शोर 

हर किसी में भागने की होड़ 

तनहाई से दूर खिंच ले जाती है भोर ,

किंतु बाहर पसरा बेतरतिव ख़ामोशी 

मुलायम चादर के बाहर ले जाती है उसके पैर 

रात की ख़ामोशी समझ आती है , किंतु 

भोर की ख़ामोशी , जगा जाती है 

वह दुख किसका मनाये , सपनों का छुट जाने का 

या सपनों को हकीक़त में बदलने का 

रविवार, 26 फ़रवरी 2023

सींचता वह मासूमियत है ......

वह कोशिस करता लगातार 

मासूमियत जो समय के साथ 

दूर हो चुकी थी उससे 

और ले गई थी ,अपने साथ 

उसके इंसानियत को , अपने मोह पाश में 

वह कोशिस करता लगातार 

सींचने की मासूमियत को 

ताकि पनप सके इंसानियत भी 

हवाओं ने भी भरपूर साँसे भरी है 

मिटटी के संग पला बढ़ा ,

ताकत पाया पानी से , अग्नि ने उसे 

सिखाया है जलकर उर्जा भरना ,

वह कोशिस करता लगातार् 

मासूमियत जो समय के साथ 

दूर हो चुकी है उससे , जिन्दा कर सके वह ,

भीड़ का साथ भी , उसे अकेला कर देता है ,

उसके ललाट पर कई वर्षो से 

एक मुखौटा पड़ा हुआ है , 

इंसान होने का गुमान उसमे भर रहा है 

मुखौटे के कई बेतरतिव रंगो ने 

छीन लिया है उसके चेहरे की असली रंगत 

है उतावला वह , है पड़ेशान भी 

किसी बच्चे की मासूमियत ने 

बता दिया है ,उसके मुखौटे का रंग 

दम्भ से भरा पड़ा , गुमान में डूबा हुआ 

इंसान होने का घमंड उसे , उससे 

दूर ले गया है , मासूमियत को 

वह कोशिस करता लगातार है 

एक बार पुनः सींचता है मासूमियत को 

मरने की बाते तो दूर है , वह जी सके इंसानियत से 

वह कोशिस करता लगातार है |

रविवार, 5 फ़रवरी 2023

धुंध जो निचे उतर रही .........


कुछ धुंध जो निचे उतर रही ........

अहिस्ता -अहिस्ता जमीं पर गिर रही 

चाँद से  दिखते उनके अक्स को छुपा रही है 

एक मखमली पर्दा गिर रही है ,मन के दरवाज़े पर 

यादें हैं या वादलो के टुकड़े है , 

कुछ धुंध घनेरी फैला रही है ............

अहिस्ता -अहिस्ता जमीं पर उतर रही है 

उनके आँखों के वद्लियाँ भी खो रही है |

यादें हैं या वादलो की मस्तियाँ 

शोखी हैं या गुश्ताखियाँ .............

रूह को छुपा लेने को , यादों के तहखाने में 

कुछ धुंध जो निचे उतर रही है .............

अहिस्ता -अहिस्ता मन के जमी पर फ़ैल रही है 

घूँघट से छुपे उनके अक्स को छुपा रही ,

हल्के पुरवाई में लहराते घूँघट से दिखते 

उनके माथे की कथ्थई  विन्दियाँ को भी नही छोर रही है |

पुरवाई के संग -संग निकले उनके हंसी को छुपा रही है 

किसी बिजली सी कौंधती उनकी हंसी भी ,

दर्द की लम्बी चादर फैला रही है .........

कुछ धुंध जो निचे उतर रही है .............

उनके मनमानियो के वद्लियाँ बहुत कुछ छुपा रही है 

उनके अक्स को छुपा लेने को मचल रही है 

अहिस्ता -अहिस्ता मन के जमीं को ढक रही है |

संग -संग मचलने को तैयार हूँ ,

धुंध संग खो जाने को वेकरार मन 

उनके चाहत भरे क़ैद में गुम हो जाने को 

आँखों की वद्लियों के पानी हो जाने को 

कुछ धुंध जो निचे उतर रही है .......

संग -संग मचलने को तैयार हूँ |