मंगलवार, 1 फ़रवरी 2022

बस इतना सा ख़्वाब है....

 

                 

                                                                 कोई 21-22 साल पहले एक गाना ने औसत भारतीय लोगो के सोये हुए सपने को पानी के छीटें मारकर जगाया था , इसी के कारण गाना जबदस्त हीट साबित हुआ था | गाना के बोल इस प्रकार थे  " तेरी ऊँची शान है मौला , मुझको भी तो लिफ्ट करा दे , मोटर गाडी कार दिला दे ,एक नही दो-चार दिला दे ............|" 

                        ये तो सपनों को जबरदस्ती जगाने की बात हुई , उसके बाद इसी गाना में एक औसत भारतीय का जलन या दर्द भी दीखता है | शायद अपनी अभाव व  नाकामी की वजह से उसके सीने में जलन या दर्द  पैदा हुआ हो | जलन के बोल इस प्रकार थे इसी गाना में आगे  " कैसे -कैसो को दिया है , वैसे-वैसों को दिया है | मुझको भी तो लिफ्ट करा दे "|

                      यही कोई 10-15 साल पहले मैंने कहीं पर एक मजाक पढ़ा था | जो इस प्रकार था -

"एक गरीब व्यक्ति नित्य दिन सुवह के आरम्भ में अपने घर से थोड़े दूर पर एक सेठ के घर के आगे जाता व खड़ा होकर सेठ के निकलने का इन्तजार करता रहता | जब सेठ अपने बंगले से निकल कर अपने ऑफिस जाने लगता तो ,गरीब व्यक्ति सेठ को देखकर अपने एक हाथ से दुसरे हाथ में रोटी तोड़कर खाने की नाटक करता | यही प्रक्रिया कई दिनों से उस गरीब व्यक्ति के द्वारा किया जाता रहा | एक दिन सेठ से रहा नही गया ,और उसने अपने गाडी में बैठने से पहले , गरीब व्यक्ति के पास आकर झल्ला कर पूछा " प्रतिदिन मेरे घर के आगे ,मेरे ऑफिस जाने के वक्त हीं ये क्या नौटंकी करते रहते हो |"

                                       गरीब व्यक्ति बड़ी मासूमियत के साथ सेठ के सबाल में से आधे सबाल का जवाब दिया " साहब मै नमक और रोटी खा रहा हूँ " और अपनी प्रक्रिया में  फिर से व्यस्त हो गया |

     अबकी सेठ कुछ ज्यादा ही झल्लाहट  से उस गरीब को बोला " जब तुम सपना ही देख रहे हो तो नमक -रोटी खाने का सपना क्यू देख रहे हो ? हलवा -पूरी खाने  का सपना देखो |"

                                       गरीब व्यक्ति पुनः उतनी हीं मासूमियत से कहता है " साहब हलवा-पूरी खाने का सपना देखना हो तो देख लें , लेकिन उसको पचायेगा कौन " ? 

        अबकी सेठ के पास दूसरा सबाल हीं नही था | चुपके से गाडी में बैठ जा चूका था |

मैंने उपर पंक्ति में " आधे सबाल का जवाब " शब्द का प्रयोग किया है उसका कारण है " गरीब के द्वारा यह नही बताया गया था की वह सेठ के घर के आगे हीं क्यों , नाटक करता था " |

                आज आप सभी सोंच रहे होंगे की मैंने ऊपर दो विपरीत तरह के सपनों की चर्चा क्यों किया है | वो भी आज , एक 21-22 साल पहले का दूसरा 10 -15 साल पहले का | 

               " क्या उपरोक्त दो उदाहरण आज के " आत्म-निर्भर भारत " के समय काल में प्रासंगिक है या | यूँ हीं कुछ लिख दिया गया है |"

                  चुकीं मै अर्थ-व्यबस्था का एक्सपर्ट नहीं हूँ इसलिय पूरा बजट भाषण सुनने के बजाय न्यूज़ चैनल के दिखाए जा रहे न्यूज़ व उसमे बिभिन्न तरह के एक्सपर्ट द्वारा बजट विश्लेषण से काम चला रहा था | 

                  जिसमे दो तरह के दृश्य ने मुझको ज्यादा पड़ेशान किया | पहला दृश्य " बजट भाषण के बाद का दृश्य लोकतंत्र के मंदिर के आगे का ' सरकार के लोगो के द्वारा इस साल के बजट को आत्म-निर्भर भारत बनाने वाला बताया गया , जिसमे 25 साल का रोडमेप है , इस साल  इसमें 39.44 लाख करोड़ खर्च होगा , 60 लाख नौकरी की व्यबस्था  किया जायेगा , और भी बहुत कुछ बताने लगे " 

        उसी दृश्य का दूसरा भाग बिपक्ष के सम्मानित नेता इसे ढकोसला बताते है , और इस बजट को 10 में से 3 मार्क देकर , कहा की इसे मै चुनाव में मुद्दा बनाऊंगा , हमे फायदा होगा "

                    मेरा मन उदाश हो गया  , उसके बाद मैंने दूसरा न्यूज़ चैनल अपने टीवी पर चलाया -

    दूसरा दृश्य ' प्रसिद्ध हिंदी न्यूज़ चैनल की सुप्रसिद्ध एंकर एक सुपर माल में एक टैक्स एक्सपर्ट के साथ  इंटरव्यू कर रही थी , और कभी जूते चप्पल के दूकान के आगे जाती तो कभी गहने जेवर की दूकान के आगे तो कभी कपड़ो के दूकान के आगे | ये सब इंटरव्यू करते हुए हो रहा था | इस इंटरव्यू की खासियत जो मैंने महसूस किया की एक्सपर्ट के द्वारा बार-बार एक बात दुहराया जाता रहा  " सरकार ने पिछले दो सालों में ( कॉविद-19 ) बहुत ज्यादा खर्च किया है , बहुत ज्यादा खर्च किया है |" और बजट को आत्म निर्भर भारत बनाने वाला बताया जाता रहा |

                  मेरा मन पुनः उदाश हो गया | टैक्स एक्सपर्ट ऐसे सुना रहे थे जैसे सरकार ने कोई मेहरवानी कर दिया हो , और जो खर्च किया है शायद सरकार ने खुद कमाई किया हो |

       मै अपने जान -पहचान बालो में बहुतो को जानता हु जो इसी काल में रोटी-रोटी को मोहताज़ हुए | एक तो खुद मेरा ही दोस्त ,जिसके साथ मैंने पहली वर्ग से साथ साथ पढाई किया था | मुझे नौकरी मिल गयी किंतु उसे नही | परिवार चलाने के लिए गांव की निजी स्कूल में ही शिक्षक था | किंतु उस दुखदाई काल में स्कूल बंद होते ही 2-3 माह तो उधारी से काम चलता रहा | लेकिन उसके बाद उधारी मिलना भी बंद | उपाय निकला घर के आगे शाम के समय समोसा बना कर बेचने का | दो घंटे की दूकान वो भी गाँव में कितना आय हो सकता है | उससे परिवार चल सकता है , बच्चे पढाई कर सकते है | ढंग के कपडे , मकान मिल सकता है | कोई समझाए उस टैक्स एक्सपर्ट ,न्यूज़ एंकर और पक्ष-विपक्ष दोनों को |

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