मंगलवार, 3 मई 2022

मेरे मन



कुछ धुंधला , कुछ उजला सा ,

कुछ मतलवी , कुछ लापरवाह सा ,

कुछ चटख , कुछ मटमैला सा ,

कुछ रेशमी , कुछ खद्दर सा ,

मेरे    मन   निकल    सको  ,

तो निकलो , ख्वावो के अतरंगी मेले से |

कुछ - कुछ दिन् रात के संगम सा ,

कुछ - कुछ इश्क के परवाज़ सा ,

कुछ - कुछ चाँद के आगे खड़े जंगल सा ,

कुछ -कुछ पहाड़ो को पाटते - गिरते दरिया सा ,

कुछ - कुछ कली से बनते फूल सा ,

कुछ - कुछ कोंपल से बनते दरख्त सा ,

मेरे    मन    निकल    सको ,

तो निकलो ख्वावो के अतरंगी मेले से |

जैसे चाँद व सूरज निकलते विपरीत परिवेश से ,

एक ने खुद को जलाया तो रोशन कर पाया दिवस्  को ,

दूजे ने खुद को तपाया तो , महका पाया निशा को ,

मेरे मन निकल सको तो निकलो |

कुछ धरती , कुछ अम्वर सा ,

कुछ पतझर  , कुछ वसंत सा ,

कुछ अग्नि , कुछ धनंजय सा ,

कुछ वायु , कुछ पानी सा ,

कुछ कोमल , कुछ कठोर सा ,

कभी प्रेम तो कुछ इर्ष्या सा ,

मेरे मन निकल सको तो निकलो ,

ख्वावो के अतरंगी मेले से !

सुना है , आज भी तलाश है चाणक्य को 

एक  चक्रवर्ती  राजा की  ,

जो पहले खुद को जीते ,तो जीत सके !

जो बना सके अपने कमजोरी को ताकत !

जो गढ़ और सज़ा सके , दुनिया व दुनियादारी को |

मेरे मन निकल सको तो , निकलो ,

एक अनजानी , तिलिस्मी दुनियाँ से ,

मै हीं मिल जाऊ , विष्णुगुप्त को उसके सांचे में |



                    **********




5 टिप्‍पणियां: