रविवार, 21 सितंबर 2025
बुधवार, 1 जनवरी 2025
आने वाला पल ..
गुज़रे कल की रश्में ..
कुछ वादे कुछ कस्मे
अपनों को ढूंढने की रींते..
आने वाले पल की ख्वाहिशें
ले चलेंगी हमको ,
नई कल के पास |
उम्मीदों भरी काजल ,
जो शोखियाँ बढ़ाती उनके आँखों की
भरती हमारे जीवन में प्यार की थपकी |
आने वाला पल ..
विल्कुल नई कविता की तरह
गुद-गुदाती उसके रंग
शर्दी की ठंडाई को
धता वताती उसके उमंग
साथ में याद दिलाती ..
पिछले कुछ अधूरे सपने ,
जो शेष रही,खुद के किसी कोने में |
आने वाला पल ..
कल हो जायेगा ..
विता हुआ पल ..
दो शब्दों में झूलते हुए हम
कभी निकल पायेंगे ,समय के साथ
बदलते शब्दों की तक़रीर से
बदलते तारीखों के अंक के मोह पाश से
आने वाला पल ..
ले चलेगी हमको
नयी कल के पास ,
उम्मीदों भरी सपनों के संग |
***
शनिवार, 28 दिसंबर 2024
ख़्वाब को कभी -कभी पुरे होते हुए जागना
ख़्वाब को कभी -कभी पुरे होते हुए जागना | कभी कभी बीच ख़्वाब में नींद से जगना | कभी-कभी एक मीठा सा एहसास करा जाती है, तो कभी -कभी दर्द की एक धुंधली सी रेखा खिंच जाती है, आपके चेहरे पर | कभी -कभी ख्वाबों में रहने के लिए..... .................सदा के लिए .......................एहसास करा जाती है, ये अतरंगी ख्वाबें |
सुन्दरम ,शानू ,नौटंकी नामो से प्रचलित अपने मम्मी -पापा के लिए शायद एक ख़्वाब ही था | जिसकी एहसास आज तक बरक़रार है ,बिलकुल खुश्बू की तरह |
हवा में खुश्बू की फितरत होती है की जितने वह हमसे दुर होती जाती है , उतनी ही अपना होने की एहसास कराती रहती है ,
तो अपने आपको हवा में खो जाने का दर्द भी देती रहती है |
खैर बात सुन्दरम की ,एक छोटा सा ,नन्हा सा गोरा -चिट्टा ,घुंघराले बालो वाला लड़का जो अपनी पनीली आँखों से व आँख के ऊपर भौवो से ही शरारत करने के लिए जाना जाता था | जिसकी आँखों में सारे जहाँ की बाल -मन में उठने वाली शैतानियों का रेला आया -जाया करता था | जो शायद समझ भी चूका था, हाथ -पाँव के बदले आँखों से ही शरारत कर सकता है वह |
जो डाक्टर से लेकर कई अजनबियों के नज़र में लड़की होने का भ्रम देता रहता , उसको हम अपने जिन्दगी के सपनो में कौन-सा सपना कहें या हकीक़त जो अब ख़्वाब बन चूका है , जिसकी खुश्बू आज भी यादों की वादियों में परवाज़ करती है |
अंतर्द्वंद में एक माँ , एक पिता | दोनों का ऐसा ख्वाव जो सुनहरी रेत की पृष्ठ-भूमि पर सुनहरे सूर्य-किरण से
चमकता, आँखों को धोका देने वाली एक मृग-मरीचका जो आँखों को सुकून तो देती है , मन में अपने को सच्चा होने का भ्रम भी |
उस भ्रम की स्थिति में एक अस्पष्ट सा चित्र !
चित्र से याद आया ......... अगर, उस बच्चे का चित्र केनवास पर उतारी जाय तो , हु-ब-हु उसके माँ से मिलता जुलता तस्वीर उतर जायगी | विडंबना देखिये की हमारे यहाँ एक कहावत प्रचलित है " जिस लड़की का चेहरा -शुरत अपने पिता पर होती है ,वह भाग्यशाली होती है ,उसी तरह जिस लडके का चेहरा -शुरत अपने माँ पर गया हो ,वह भाग्य -शाली होता है |"
ये कहावत है , मुझे तब समझ में आया जब उसे हकीकत समझ या की अपने जिन्दगी का हिस्सा या की एक अधूरी ख़्वाब ? निर्णय लेने में एक बाप का दिल ,एक माँ का दिल असमर्थ सा , बेवस सा था | जैसे रेगिस्तान में छाया ढूंढ़ता हुआ कोई राहगीर मीलों चलकर ,खजूर पेड़ के पास पहुँचने की ख़ुशी मनाये | तब आप उसे क्या कहियेगा ! स्वप्नजीवी या वास्तविकता के बीच फँसा इन्सान |
जो मर्ज़ी .................................... पुकार लीजियगा |
किंतु एक हकीक़त ........जब देश के नामी- गिरामी अस्पतालों में से एक राजधानी की अस्पताल के डाक्टर द्वारा जब उस नन्हे सी जान को " खाली डब्बा " करार दिया जाय | शांत होती शहर की चकाचौंध में रात की अंतिम मेट्रो पकड़ने भागती चार जोड़े पावों को रोकती , कानों में गूंजती डाक्टर की आवाज़ ........" ये खाली डब्बा है,आप-दोनों दुशरे बच्चे की तयारी करो " |
रोते हुए आँखों में भी ख़्वाब दस्तक दे जाती है | अस्पताल से मेट्रो स्टेशन तक हम-चार लोगो (उसके नाना -नानी भी थे ) में कोई बात-चित नही | मानो मध्यम होती शहर की रौशनी , व्यस्त रहने वाली शहर की शांत होती कोलाहल , सभी का साथ मिल रहा हो |
उस पल को बोझिल बनाने ,व इस पल में भी, उसके माँ-बाप को फिर से एक सपना बुनने का |
एका-एक उस बोझ बने पल को भंग करती उसके माँ की आवाज़ जो मुझसे से मुखातिब था " मै इसे ठीक , करके रहूंगी " मेरा रुआंसे व भरे गले से शिर्फ़ ' हूं " का प्रति -उत्तर |
इन सारी बातो से बेपरवाह बच्चा अपने बाप के सिने में सिमटा -लिपटा कंधे पर झूलता हुआ गहरी नींद में मगन सोया हुआ था | उसे क्या पता था डाक्टर के बातो का अर्थ ,उसे क्या लेना था " खाली -डब्बा " जैसे शब्दों से | अच्छा ही था की वह डाक्टरी भाषा से अनजान था ,नही तो उसके भी आँखों में एक नन्हा सा ख़्वाब तैरता " स्वास्थ्य होने " का ख़्वाब | उसकी वे-जान सी हाथ -पाँव के साथ एक निढाल सा शरीर पर एक हँसता हुआ सा चेहरा , उसकी आँखे ही प्यार , गुस्सा ,हंसी -मजाक की शरारती भाव बयाँ कर सकती थी | उस खाली सा डब्बे का हम -दोनों के जिन्दगी में क्या महत्व था , उसके गये कई -बर्षो बाद भी जवाब नही मिल पाया है !
उसे अपने गोद में लिए एक दिन मै , गाना गा रहा था " तुझे सूरज कहूँ या चंदा .....
दीप कहूँ या तारा ......................" | आज तारों के बीच उसे ढूंढने का झूठा सा कोशिश करता बाप | व अपने कोशिस को छुपाती एक माँ |
डाक्टर के अनुसार वह सेरेब्रल -पाल्सी से पीड़ित था | जिसका उपाय शिर्फ़ -व शिर्फ़ एक माँ-बाप के लिए दुसरे बच्चे की तैयारी करना है | डाक्टर की सलाह अच्छी हो सकती है | एक माँ-बाप के सपनों से सज़ा पहले बच्चे के बारे में अनगिनत ख्वाबों के बीच फंसे दो आँखों के जोड़े का दर्द या बेवसी का क्या कीजियेगा | जिसे भोर का ख़्वाब भी नही कह , सकते | एक दिन यूँ ही ठण्ड की अँधेरी रात को चीरते हुए ,सूरज अपने आ धमकने की ज़िद्द पर अड़ा हुआ था ,उसके लाव-लश्कर आकाश में चारो तरफ सूरज के साम्राज्य के विस्तार करने में एक सुहावना सा वाताबरण का निर्माण , व सुवह होने की भरोशा दिला रहे थे ,किंतु कुहांसे के बीच फँसे दम तोरती उनके प्रयाश |उन्ही पल में वह नन्हा सा जान अपने अंदर के दर्द को अपने सूर्ख पड़ चुके व उनींदी सी आँखों के बीच सदा के लिए छुपाने की कोशिस में कामयाब हो चूका था | ठण्ड की ही रात को चीरकर आते हुए भोर में आया था वह |
एक पन्ना पलट चूका था ,एक हिस्सा बीत चूका था | हम-दोनों के ज़िन्दगी का | आज वह होता तो उसकी माँ उसके जन्म -दिन की आंठ्वी वर्ष-गांठ मनाने की तैयारी कर रही होती |
रविवार, 26 मार्च 2023
खामोश आवाज़े
हर तरफ , हर किसी ने मचा रखा है शोर
फिर क्यू उदाश है , ख़ामोशी की फितरत
कभी तन्हा हम रहते है , कभी वो तन्हा
चुपके से आने वाली -फु-फुसाहट के शोर
तन्हाई से दूर खिंच ले जाती है भोर
मन के कंही अंदर से निकलती है -
खामोश आवाज़े , छटपटाकर रख देती है ,
रात-दिन के मिलन का शोर
हर किसी में भागने की होड़
तनहाई से दूर खिंच ले जाती है भोर ,
किंतु बाहर पसरा बेतरतिव ख़ामोशी
मुलायम चादर के बाहर ले जाती है उसके पैर
रात की ख़ामोशी समझ आती है , किंतु
भोर की ख़ामोशी , जगा जाती है
वह दुख किसका मनाये , सपनों का छुट जाने का
या सपनों को हकीक़त में बदलने का
रविवार, 26 फ़रवरी 2023
सींचता वह मासूमियत है ......
मासूमियत जो समय के साथ
दूर हो चुकी थी उससे
और ले गई थी ,अपने साथ
उसके इंसानियत को , अपने मोह पाश में
वह कोशिस करता लगातार
सींचने की मासूमियत को
ताकि पनप सके इंसानियत भी
हवाओं ने भी भरपूर साँसे भरी है
मिटटी के संग पला बढ़ा ,
ताकत पाया पानी से , अग्नि ने उसे
सिखाया है जलकर उर्जा भरना ,
वह कोशिस करता लगातार्
मासूमियत जो समय के साथ
दूर हो चुकी है उससे , जिन्दा कर सके वह ,
भीड़ का साथ भी , उसे अकेला कर देता है ,
उसके ललाट पर कई वर्षो से
एक मुखौटा पड़ा हुआ है ,
इंसान होने का गुमान उसमे भर रहा है
मुखौटे के कई बेतरतिव रंगो ने
छीन लिया है उसके चेहरे की असली रंगत
है उतावला वह , है पड़ेशान भी
किसी बच्चे की मासूमियत ने
बता दिया है ,उसके मुखौटे का रंग
दम्भ से भरा पड़ा , गुमान में डूबा हुआ
इंसान होने का घमंड उसे , उससे
दूर ले गया है , मासूमियत को
वह कोशिस करता लगातार है
एक बार पुनः सींचता है मासूमियत को
मरने की बाते तो दूर है , वह जी सके इंसानियत से
वह कोशिस करता लगातार है |
रविवार, 5 फ़रवरी 2023
धुंध जो निचे उतर रही .........
रविवार, 22 जनवरी 2023
चाहतो के दरवाज़े पर .........
चाहतो के दरवाज़े पर ......
कांपते अपने पांवों को
ताकत का एहसास कराता
मन के कंही किसी कोने से
आती आवाज़ को पहचानने की कोसिस में ,
जड़ खड़ा वह देखता
सूनी रास्तो से गुज़रता ....
थका देने वाले सफर का एहसास
जड़ खड़ा कर देता है उसे
चाहतो के दरवाज़े पर ........
उसके चेहरे को छूकर निकलती
सर्र -सर्र हवा के झोंके
दोनों हाथ से थामता दरवाज़े का खम्भा
दिल की कंही गहराई से
आती आवाज़ को पहचानने की कोसिस में
जड़ खड़ा वह देखता
मंजिल तक पंहुचाने वाली रास्ता
बोझिल करती हुई उसकी खुद की साँसे
दम घुटाते उसकी खुद की आंहे
जड़ खड़ा कर देता है उसे
चाहतो के दरवाज़े पर .............
उसके गहरे पर उदास आँखों से
गुजरती सतरंगी ख्याल
उसे पंहुचा देने को ......
एक नई राह दिखाने को
कांपते पांवों में ताकत भरता
नई उर्जा से लवरेज हवाओं को
उसके तरफ मोरता
खुद की हद तोड़ने की
जिद्द उसी के आँखों में भरता
एक निश्चय के दम से
बहुत दूर भाग जाने की मंशा
चाहतो के दरवाज़े से
दूर उसे भगा ले जाती है
उसे उसके हद से बाहर
केवल उसके आँखों की उदासी ....
रह जाती है -
चाहतो के दरवाज़े पर |
*************
मंगलवार, 10 जनवरी 2023
दो - तीन क़दम
दो - तीन क़दम
मंगलवार, 26 जुलाई 2022
कभी आधा कभी ज्यादा ,
समय चक्र दो पाटो में बंटा पड़ा
कभी दिन ज्यादा कभी रात आधा
ख्वाबो के मेले में खींचती लक्ष्मण रेखा ,
होना किसका है , होती निरंतर लड़ाई है
खुद के आगे भागे या ख्वाबो के पीछे
या शाम की उदाशी ओढ़ खो जाये एकांतवास में
इसी द्वंद ने सिखाया है ,
कभी हम ज्यादा कभी ख़्वाब ज्यादा
कभी धुप घनी कभी छांव घनी
कभी पाँव बढ़े कही हाथ बढे
चलती निरंतर द्वंदों की पुरवाई है
कभी हम ज्यादा कभी गम ज्यादा
साँझ की आहट में लौटते परिंदे
आवाज़ देती हमे चिढाती
कुछ चाही कुछ अनचाही
पलो का फिर से दुहराने की तमन्ना
फिर से किसी गलती की कोशिश तो नहीं ?
या हमारी हस्ती सिर्फ ख्वावो के में कैद में रहेगी
हमे बताती रात को गिरते ओस की बुँदे
एक डाल से दुसरे डाल पर
दुसरे से तीसरे डाल पर न जाने कितनी डाल पर
उडती बैठती , आँख दिखाती इक्षाओ के तितली ,
कभी हम ज्यादा कभी ख्वाव ज्यादा
खुद के आगे भागे या इनके पीछे |
*******
मंगलवार, 21 जून 2022
बचपन वाले वादियों में ......
बचपन वाले वादियों में
उड़ते कहानियो के वादल
कुछ हल्के कुछ भारी बादल
जिन्दगी के वेअद्वी में भरते
कुछ अच्छे कुछ सच्चे काजल
विना रुके विना थके
नाप लेता कई वर्षो की दुरी
दिखा जाती अपने संग संग
पलभर की उडान में जादू भरे रंग
कुछ खट्टे कुछ मीठे पल
पर अच्छे और सच्चे कल
गेंहू खेत के मेड़ो पर भागते ,
आम के टिकोले सा गिरते
टहनियों के सेज पर गिनते सपनों वाले पल
गर्मी की छुट्टी से भागते ,
खिचड़ी के संग चटनी सा
अपने पास बुलाते बीते पल
मास्टर जी के छड़ी से डरते ,हाथ छुपाते बीते कल
चोरी किये आम टिकोलो के हिस्सेदारी में
लड़ते झगरते बचपन की यारी
झुलसते सूरज को हरा जाती
मिल बांटकर खाने की तैयारी
कच्चे घरो के छपरी से लटकते
अपनों को सताने की होशियारी
कुछ सच्चे कुछ अच्छे बेईमानी
जुगनू भरे रात की वैशाखी
सांझ पड़ते डराती दादी की खांसी
और डराती चाँद पर की बुढिया
किस्सों के वाराती में घूमते मस्त मलंग नादानी
छुट्टियों की तालाश में भटकते बीते कल की कहानी |
**************











